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दहेज एक अभिशाप!

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Kirti mala

कीर्ति माला

“कहते हैं दहेज एक अभिशाप है,
दहेज लेना बहुत बड़ा पाप है।”

पर अभी तो ये वाक्य ही बन गया है झूठा। क्योंकि,

”जो लेते सबसे अधिक दहेज उनकी ही समाज में बहुत बड़ी साख है…
और उनके लिए ये अभिशाप ही सबसे बड़ी सौगात है।”

”और जो लोग करते है इसका विरोध वो समाज में कहलाते नापाक है…
जो बढ़-चढ़कर लेते है इसमें हिस्सा उनके लिए ये गलती भी गुस्ताख माफ है।”

“क्योंकि वर्तमान में दहेज पाने वाले व्यक्ति ही समाज में हीरे जैसा खास है…
जिन्हें नही मिलता दहेज उनकी जिंदगी ही समाज वालों की नजरों में एक पाप है।”

यही है वर्तमान में दहेज की अभिशाप की सच्चाई…

”जो लोगों को पैसों की आड़ में करता नाश है पर ऐसे लोगों को न ही इस पाप का कोई एहसास है।
क्योंकि वो तो समाज में सत्कारों के मामले में खासमखास है।”

इतना ही नहीं दहेज तो शेयर बाजार का हिस्सा ही है बन गया जो नौकरी के आधार पर घटता और बढ़ता है जैसै मुद्रास्फीति के आधार पर बाजार मूल्य बढ़ता और घटता है। वैसे ही दहेज भी सरकारी और प्राइवेट नौकरी के आधार पर घटता और बढ़ता है। पर सोचना होगा उन बुद्धिजीवियों को जो बताते कि दहेज एक अभिशाप है…

”पर खुद क्यों इस मामले में करते ये पाप है।
कैसे खत्म होगा ये अभिशाप?”

क्योंकि कानून बनाने वाले ही संलिप्त हो रहे इस अभिशाप में।

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