BREAKING NEWS
Search
Congress Nikesh Kumar singh

कांग्रेस नेता निकेश कुमार सिंह ने देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के पुण्यतिथि पर उन्हें कोटि कोटि किया नमन

426
Lalit Kishor

ललित किशोर कुमार

बांका। जिला कांग्रेस प्रवक्ता निकेश कुमार सिंह ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की पुण्यतिथि पर कोटी नमन वंदन के साथ-साथ उनके राह पर चलने के लिए सभी कार्यकर्ता और लोगों से अपील की। उन्होंने बताया कि राजेन्द्र प्रसाद जी का जन्म 3 फरवरी 1884 को बिहार के जीरादेई नामक ग्राम में हुआ था।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी राजेन्द्र बाबू देश हित को सर्वोपरि समझते थे। राष्ट्र से बढ़कर उनके लिये कुछ नहीं था। उन्हें राष्ट्र का प्रथम पुरुष होने का भी गौरव प्राप्त हुआ।बचपन से ही मेधावी राजेन्द्र बाबू अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते थे। डॉ.राजेन्द्र प्रसाद के पिता महादेव सहाय संस्कृत व फारसी के विद्वान थे एवं उनकी माता कमलेश्वरी देवी एक धर्मपरायण महिला थीं।

पांच वर्ष की उम्र में ही राजेन्द्र बाबू ने एक मौलवी साहब से फारसी में शिक्षा शुरू किया। उसके बाद वे अपनी प्रारंभिक शिक्षा के लिए छपरा के जिला स्कूल गए। राजेंद्र बाबू का विवाह उस समय की परिपाटी के अनुसार बाल्य काल में ही, लगभग 13 वर्ष की उम्र में, राजवंशी देवी से हो गया।

विवाह के बाद भी उन्होंने पटना की टी. के. घोष अकादमी से अपनी पढ़ाई जारी रखी। उनका वैवाहिक जीवन बहुत सुखी रहा और उससे उनके अध्ययन अथवा अन्य कार्यों में कोई रुकावट नहीं पड़ी।

लेकिन, वे जल्द ही जिला स्कूल छपरा चले गये और वहीं से 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा दी। उस प्रवेश परीक्षा में उन्हें प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था। साल 1902 में उन्होंने कोलकाता के प्रसिद्ध प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया। उनकी प्रतिभा ने गोपाल कृष्ण गोखले तथा बिहार-विभूति अनुग्रह नारायण सिन्हा जैसे विद्वानों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

1915 में उन्होंने स्वर्ण पद के साथ विधि परास्नातक (एलएलएम) की परीक्षा पास की और बाद में लॉ के क्षेत्र में ही उन्होंने डॉक्ट्रेट की उपाधि भी हासिल की। राजेन्द्र बाबू कानून की अपनी पढाई का अभ्यास भागलपुर, बिहार में कया करते थे।

1934 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में अध्यक्ष चुने गये। नेताजी सुभाषचंद्र बोस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने पर कांग्रेस अध्यक्ष का पदभार उन्होंने एक बार पुन: 1939 में संभाला था। भारत के स्वतंत्र होने के बाद संविधान लागू होने पर उन्होंने देश के पहले राष्ट्रपति का पदभार संभाला।

राष्ट्रपति के तौर पर उन्होंने कभी भी अपने संवैधानिक अधिकारों में प्रधानमंत्री या कांग्रेस को दखलअंदाजी का मौका नहीं दिया और हमेशा स्वतंत्र रूप से कार्य करते रहे। हिन्दू अधिनियम पारित करते समय उन्होंने काफी कड़ा रुख अपनाया था। राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने कई ऐसे दृष्टान्त छोड़े जो बाद में उनके परवर्तियों के लिए मिसाल के तौर पर काम करते रहे।

भारतीय संविधान के लागू होने से एक दिन पहले 25 जनवरी 1950 को उनकी बहन भगवती देवी का निधन हो गया, लेकिन वे भारतीय गणराज्य के स्थापना की रस्म के बाद ही दाह संस्कार में भाग लेने गये।

12 वर्षों तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करने के पश्चात उन्होंने 1962 में अपने अवकाश की घोषणा की। अवकाश ले लेने के बाद ही उन्हें भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया। ऐसे महान महामानव को मेरा कोटि कोटि नमन।