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Coronavirus Changed everyones lifes

कोरोना ने बदली सब की जिंदगी

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Anamika Amitabh Gaurav

अनामिका अमिताभ गौरव की कलम से,

विचार। आज से चार महीना पहले तक हर कुछ सामान्य था शायद सिर्फ रिश्ते असामान्य हो रहे थे। सब कुछ अपनी ही धारा में चल रही थी और फिर कोरोनावायरस आया।

हर कुछ बदल गया मेरा ऐसा मानना है कि, कोरोनावायरस सिर्फ मजदूरों को ही नहीं यह हर किसी को प्रभावित कर रहा है। ऐसा कोई घर नहीं है जो इस वायरस से होने वाली समस्याओं से न जूझ रहा है। अगर हम अपने आसपास नजर घुमाते हो तो देखते हैं, कितने हमारे ऐसे मित्र होंगे जिनकी नौकरी छूट गई है, कितने ऐसे होंगे जिन्हें महीनों तक सैलरी मिलने की उम्मीद नहीं होगी। अगर हम सोचने बैठे तो देखते हैं कि हमने ऐसा क्या कर डाला जिससे हमें इतना कुछ सहना पड़ रहा है।

तो मुझे अपनी ही रचित पंक्तियां याद आती है —–

“अरे मानव अब तो ठहर जा,
कुछ तो सीख औरों को सिखा।

सीख ले अपनों से सीख ले प्रकृति से, तू ने सबक नहीं ली तो प्रकृति ने सबक सिखा दिया।

भेज दिया करोना को, इंसान की औकात बता दिया।”

शायद बड़े बुजुर्ग ठीक ही कहा करते थे कि जैसा करोगे वैसा ही भरोगे और हम भर रहे हैं। मैंने भविष्य को लेकर कई अनुमान लगाए हैं। लेकिन मेरा अनुमान इस बात पर निर्भर करता है कि सरकार और समाज कोरोनावायरस को कैसे संभालते हैं।

हो सकता है कि हम इस संकट के दौर से एक ज्यादा बेहतर और ज्यादा मानवीय अर्थव्यवस्था बन कर उठेंगे। लेकिन यह भी हो सकता है कि हम कहीं अधिक बुरे हालात में भी जा सकते हैं।

कोरोनावायरस से भले ही अभी निपटने का तरीका नहीं समझ आ रहा है लेकिन इसका मूल लॉजिक बेहद आसान है लोग आपस में मिल जुल कर रह रहें हैं और संक्रमण फैला रहे हैं।

ऐसा घरों दफ्तरों यात्रा में भी हो रहा है। अगर मेलजोल भीड़भाड़ कम कर दी जाए तो एक शख्स से दूसरे शख्स को वायरस का ट्रांसमिशन रुकेगा और नए मामलों में गिरावट आएगी। लेकिन जो भी हो कोविड-19 के संकट से एक चीज जरूर हो रहा है और वह है आर्थिक कल्पनाओं का विस्तार।

सरकार और नागरिक ऐसे फैसले ले रहे हैं जिसके बारे में तीन महीना पहले तक सोच पाना भी नामुमकिन था।

हम शायद अपने और अपनों के भविष्य को लेकर और सचेत हो गए हैं।

इसकी वजह से दुनिया के कामकाज के तौर-तरीके में बड़े बदलाव तेज रफ्तार से आ रहे हैं और आ भी सकते हैं। और साथ ही साथ इंसान और ज्यादा बुद्धि का उपयोग करने लगा है वो और ज्यादा सोचने लगा है।

यह मेरा अपना विचार है शायद सभी इससे सहमत ना हो लेकिन यह ऐसा समय है जिसकी मार हर कोई झेल रहा है चाहे वह बड़ा हो या छोटा।

अनामिका अमिताभ गौरव
रामगढिया, आरा (बिहार