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कोरोना के कारण प्रवासी मजदूरों की त्रासदी…’मजदूर हूं, मजबूर नहीं’

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Anamika Amitabh Gaurav

अनामिका अमिताभ गौरव की कलम से,

विचार। आज मेरी खुद की रचित की हुई पंक्तियां…’मजदूर हूं, मजबूर नहीं’! गलत लग रही है क्योंकि शायद आज प्रवासी मजदूर इतने ज्यादा मजबूर हो गए हैं कि उन्हें सब छोड़कर अपने राज पलायन करना पड़ रहा है तो चलिए आज हम बात करते हैं कोरोनावायरस की वजह से मजदूरों की त्रासदी पर।

कोरोनावायरस की वजह से पूरा विश्व परेशान है इस अंजान वायरस से लड़ने के लिए पूरा विश्व ने कमर कस ली है। सभी देश अपने अपने तरीके से लड़ने की कोशिश कर रहे हैं इस लड़ाई में हमारा भी देश सम्मिलित है। हमारे देश में 24 मार्च से लॉक डाउन शुरू हो गया था, तब से लेकर आज तक मजदूर एक संघर्षरत जीवन जीने को मजबूर है। चूंकि, हम सभी जानते हैं कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ 80% से अधिक मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं।

भारत में बहुत सारे लोग गांव से शहर की और रोजगार प्राप्त करने के लिए जाते हैं। सरकार ने ऐसे बहुत सारे कदम उठाए जो मजदूरों के हित में है लेकिन समस्या यह है कि मजदूरों को खुद नहीं पता है कि सरकार ने उनके लिए क्या कदम उठाया, उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा है कि वह क्या करें और सरकार द्वारा उठाए हुए कदमों को कैसे सहायता प्राप्त करें, इसका कारण है जागरूकता की कमी। मजदूरों को नहीं पता कि ऑनलाइन टिकट क्या है और क्यों और किसके लिए किए हैं, उनको यह सब कुछ पता नहीं होता है।

शायद उन्हें बताने वाला कोई नहीं है। बहुत सारे जिसके पास स्मार्टफोन नहीं है जो कंप्यूटर चलाना नहीं जानते भी नहीं है, वो कैसे करें यह सब। शायद यही कारण था कि इन समस्याओं से अच्छा था मजदूरों के लिए पैदल ही अपने घर को पलायन करना। वह तमाम मुश्किलों को सहते हुए और सब समझते बुझते हुए अपने घर की ओर निकल पड़े।

हम क्या कहेंगे इसे जागरूकता का अभाव ही तो कहेंगे की सरकार के इतने प्रयास के बावजूद मजदूरों की हालत खराब है। लॉक डाउन की वजह से मजदूरों को रोजी- रोटी मिलना बंद हो गया है।

उनकी रोजी-रोटी छिन गई शायद यही कारण है कि मजदूर अपने अपने राज्य की ओर पैदल ही चल पड़े हैं सबसे बड़ी त्रासदी तो अब है कि मजदूर अब क्या करें। वैसे तो सरकार ने बहुत सारे धन आवंटित की है इनके लिए लेकिन कब तक पहुंचेगा, यह पता ही नही है उन्हें।

कोरोना की वजह से मजदूरों की समस्या कितनी बढ़ गई है कि इनका उल्लेख भी नहीं कर सकते हैं। जिन्हें खाने की दिक्कत हो गई है उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि उनका जीवन कैसे चलेगा काम नहीं मिलेगा तो उनका क्या होगा यह बहुत सारे सवाल उनके सामने खड़ी है।

फिलहाल यह सवाल हमारे सामने भी खड़ी है की उनकी क्या मदद की जाए की वे अपने सामान्य जीवन में लौट सके। अगर ऐसा नहीं हुआ तो हो सकता है कि आने वाले समय में हमें देखने और सुनने को क्या मिल सकता है शायद सोच कर ही मन सहम जाता है।