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Delhi riots

दिल्ली दंगों ने जान-माल को ही नुकसान नहीं पहुंचाया, बल्कि देश की छवि को भी खराब किया

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New Delhi: नागरिकता संशोधन कानून बनने के बाद से उसके विरोध को लेकर जो ओछी राजनीति शुरू हुई उसका ही दुखद और भयावह परिणाम दिल्ली के दंगों के रूप में सामने आया। नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए का किसी भारतीय नागरिक से कोई लेना-देना नहीं। यह नागरिकता देने का कानून है, न कि लेने का, फिर भी विपक्षी दलों और कई तरह के सामाजिक संगठनों की ओर से यह माहौल बनाया गया कि यह भारतीय मुसलमानों के खिलाफ है। इस माहौल को बनाने के लिए जमकर भ्रांतियां फैलाई गईं।

सीएए के खिलाफ दुष्प्रचार ने लोगों के मन में जहर घोलने का किया काम

इसी दुष्प्रचार ने लोगों के मन में जहर घोलने का काम किया और इसी जहर ने दिल्ली में दंगे कराए। ये भीषण दंगे ऐसे समय हुए जब दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दिल्ली में थे और इस कारण दुनिया की निगाहें भारत की ओर थीं। यह साफ समझा जा सकता है कि दंगे कराने का मकसद सीएए का अंतरराष्ट्रीयकरण और भारत को बदनाम करना था।

पीएम मोदी यूएस राष्ट्रपति को समझाने में सफल रहे कि यह भारत का आंतरिक मामला है

यह अच्छा हुआ कि प्रधानमंत्री मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति को यह समझाने में सफल रहे कि यह भारत का आंतरिक मामला है और सीएए से किसी की धार्मिक स्वतंत्रता का कोई हनन नहीं हो रहा। यही कारण रहा कि जब अमेरिकी राष्ट्रपति से इस कानून के बारे में सवाल पूछा गया तो उन्होंने उसे भारत का आंतरिक मामला बताया। इसी के साथ धार्मिक स्वतंत्रता पर उन्होंने कहा कि भारत का रिकार्ड दुनिया के तमाम देशों से बेहतर है।

 शाहीन बाग धरना, जामिया नगर, सीलमपुर आदि इलाकों में हुई हिंसा ने दिल्ली में तनाव बढ़ाया

दिल्ली में सीएए को लेकर बीते दो महीने से तनाव चल रहा था। इस तनाव की जड़ में शाहीन बाग इलाके में सड़क पर कब्जा करके दिया जा रहा वह धरना भी है जिसके कारण लाखों लोग परेशान हो रहे हैं। इस धरने के अलावा सीएए के विरोध में जामिया नगर, सीलमपुर आदि इलाकों में हुई हिंसा ने भी दिल्ली में तनाव बढ़ाया। इस हिंसा के दौरान पुलिस पर यह आरोप लगा कि उसने जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में घुसकर छात्रों को पीटा। इसी विश्वविद्यालय के पास ही शाहीन बाग है, जहां करीब 80 दिनों से महिलाएं धरने पर बैठी हैं।

शाहीन बाग धरने पर बैठी महिलाओं को राजनीतिक दलों और संगठनों का समर्थन प्राप्त है

कहने को यह महिलाओं का धरना है, लेकिन इसे कई राजनीतिक दलों और संगठनों का समर्थन प्राप्त है। सड़क पर कब्जे के बावजूद धरना देने वाले यातायात बाधित करने को जायज बता रहे हैं। यह एक कुतर्क ही है, क्योंकि कोई भी कानून सड़क पर कब्जा करके प्रदर्शन करने की इजाजत नहीं देता। चूंकि इस धरने से लोग परेशान हो रहे हैं इसलिए उनमें नाराजगी भी है।

दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा को शाहीन बाग धरने का चुनावी लाभ नहीं मिला

दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान शाहीन बाग का धरना एक बड़ा मुद्दा बना। भाजपा ने इस धरने को जोर-शोर से उछाला, लेकिन उसे इसका कोई खास चुनावी लाभ नहीं मिला। माना जा रहा था कि चुनाव बाद यह धरना खत्म हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उलटे कुछ और स्थानों पर सड़क पर कब्जा कर धरना देने की कोशिश की गई।

तनाव ने दंगे का रूप ले लिया, 40 से अधिक लोग मारे गए, अरबों रुपये की संपत्ति जलकर राख

जब इसका विरोध हुआ तो तनाव बढ़ा और फिर इसी तनाव ने दंगे का रूप ले लिया। इस दंगे में 40 से अधिक लोग मारे गए और अरबों रुपये की संपत्ति को जलाया गया। जान-माल के इस व्यापक नुकसान के कारण स्वाभाविक तौर पर दिल्ली पुलिस सबके निशाने पर है।

दिल्ली में हिंसा भड़काने की तैयारी को पुलिस नहीं भांप सकी

सवाल पूछा जा रहा है कि आखिर पुलिस यह क्यों नहीं भांप सकी कि दिल्ली में हिंसा भड़काने की तैयारी चल रही थी? ये भीषण दंगे यही बता रहे हैं कि हिंसा के लिए अच्छी-खासी तैयारी की गई थी। इस तैयारी की भनक न लग पाना दिल्ली पुलिस की एक बड़ी नाकामी है, लेकिन इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि शाहीन बाग के जिस धरने ने दिल्ली में तनाव बढ़ाया उसे खत्म करने का काम सुप्रीम कोर्ट भी नहीं कर सका।

सुप्रीम कोर्ट शाहीन बाग धरने को खत्म करने का आदेश नहीं दे सका

सुप्रीम कोर्ट ने यह तो कहा कि इस तरह रास्ता रोककर धरना देना सही नहीं, लेकिन वह उसे खत्म करने का आदेश नहीं दे सका। उसने धरना देने वालों से बात करने के लिए वार्ताकार नियुक्त कर दिए। इससे एक तरह से अराजकता को प्रोत्साहन मिला। यह किसी से छिपा नहीं कि इसी के बाद दिल्ली का माहौल तेजी से बिगड़ा। दिल्ली में भयावह हिंसा के बाद वे भाजपा नेता भी निशाने पर हैं जिन्होंने उत्तेजक भाषण दिए। इन नेताओं की आलोचना उचित ही है, लेकिन क्या भड़काऊ भाषण केवल भाजपा नेताओं ने दिए? सच तो यह है कि ऐसे नेताओं की गिनती करना मुश्किल है जिन्होंने भड़काऊ भाषण दिए।

सबसे गंभीर समस्या मुस्लिम समाज का सीएए के दुष्प्रचार पर भरोसा करना है

इससे इन्कार नहीं कि भड़काऊ भाषण समस्या बने, लेकिन सबसे गंभीर समस्या तो मुस्लिम समाज का इस दुष्प्रचार पर भरोसा करना है कि सीएए उनके खिलाफ है। दंगों के बाद दिल्ली पुलिस के साथ केंद्र सरकार भी विपक्षी दलों के निशाने पर है।

कांग्रेस उस एनपीआर का भी विरोध कर रही जिस पर अमल उसी के शासनकाल में हुआ था

मोदी सरकार की निंदा-आलोचना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन क्या यह वही विपक्ष नहीं जिसने सीएए पर लोगों को भड़काया और गुमराह किया? सीएए तो उसी भावना के अनुकूल है जो कभी कांग्रेस ने प्रकट की थी, लेकिन उसके खिलाफ आग उगलने में कांग्रेस नेता ही सबसे आगे हैं। कांग्रेस अब उस एनपीआर का भी विरोध कर रही है जो एक सामान्य प्रक्रिया है और जिस पर अमल उसी के शासनकाल में हुआ था।

मुस्लिम समाज का हित और देश का हित अलग-अलग नहीं हो सकता

मुस्लिम समाज को इस पर विचार करना ही होगा कि उनका हित और देश का हित अलग-अलग नहीं हो सकता। आखिर जो कानून देश के हित में है वह मुस्लिम अथवा अन्य किसी समुदाय के खिलाफ कैसे हो सकता है? कोई भी देश हो वह घुसपैठियों को रोकने की कोशिश करता है और आवश्यक कानून बनाता है। क्या विपक्षी दल यह चाहते हैं कि भारत में जो भी चाहे, आकर बस जाए। यदि नहीं तो वे सीएए का विरोध करने के साथ-साथ मुसलमानों को उकसा क्यों रहे हैं?

सीएए का अराजक विरोध किसी बड़ी साजिश का हिस्सा है

ऐसा लगता है कि मोदी सरकार यह मान रही थी कि समय के साथ सीएए का विरोध बंद हो जाएगा, लेकिन दिल्ली दंगे यही रेखांकित कर रहे हैं कि सीएए का अराजक विरोध किसी बड़ी साजिश का हिस्सा है। मोदी सरकार को यह देखना होगा कि दिल्ली दंगों ने इस धारणा कोे तोड़ दिया कि उसके अब तक के कार्यकाल में देश में कोई बड़ा दंगा नहीं हुआ।

दिल्ली में हिंसा फैलाने वाले तत्वों से कड़ाई से निपटा जाना चाहिए

सीएए विरोध के बहाने जो माहौल बनाया जा रहा है उसकी काट करनी ही होगी। इसी के साथ दिल्ली दंगे के दोषियों को बेनकाब कर दंडित भी करना होगा। इससे ही अराजक तत्वों को सबक मिलेगा। हिंसा फैलाने वाले तत्वों से कड़ाई से निपटा जाना चाहिए। इसलिए और भी, क्योंकि दिल्ली दंगों ने जान-माल को ही नुकसान नहीं पहुंचाया, बल्कि देश की छवि को भी खराब किया है।