BREAKING NEWS
Search
श्रद्धालु

श्रद्धालुओं का तांता लगा रहने के बावजूद भी बुनियादी सुविधाओं से आज भी वंचित है यह मंदिर

607
Anil Upadhyay

अनिल उपाध्याय

देवास। जिले के खातेगांव तहसील मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम नेमावर में सावन माह पर्व पर नर्मदा तट स्थित सिद्धनाथ महादेव मंदिर में सावन माह में पूरे महिने दिन भर पूजा अर्चना करने वाले श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। नेमावर तीर्थ स्थल यू तो धार्मिक, ऐतिहासिक और पौराणिक दृष्टि से अतिमहत्वपूर्ण है।

लेकिन ये स्थल पर्यटन स्थलों पर मिलने वाली सुविधाओं से आज भी वंचित है। सावन सोमवार पर्व पर यहां उमडने वाला जन सैलाब देखते लायक होता है। नेमावर नर्मदा नदी का नाभि कुडस्थल होने की वजह से सभी तीर्थ स्थलों की अपेक्षा इस स्थान का महत्वअधिक है। जिला मुख्यालय से डेढ सौ किमी तथा इंदौर महानगर से यह स्थान मात्र 129 किमी दूर दक्षिण-पूर्व में तथा हरदा से 21 किमी दूर उत्तर दिशा में स्थित है।

यहां नर्मदा के जलस्तर की चौडाई करीब सात सौ मीटर है। इसका अत्यधिक बाद स्तर 275.32 मीटर है। यहां नदी पर 66.5लाख की लागत का 706 मीटर लंबा और उंचा पुल बना हुआ है। नेमावर की सबसे बडी विशेषता यह है, कि अनादिकाल के अनेक विशालकाय पुरातत्व मंदिर बने है। इनमें एक सिद्धनाथ का मंदिर इसे 1958 में मप्र शासन ने अपने अधीन कर पुरातत्व विभाग को सौंप दिया है। नर्मदा नदी के दक्षिण भाग में हंडिया ग्राम बसा है जहां भी अनेक नए पुराने मंदिर स्थापित हैं जिनमे रिद्धनाथ का मंदिर प्रमुख है।

कहा जाता है इसकी मूर्ति की स्थापना कुबेर के हाथों हुई थी। नाभिस्थल में सूर्यकुड है। इसके अलावा यहां भगवान गणेश व देवी की मूर्ति स्थापित है। नर्मदा नदी के उत्तर दिशा में एक पहाडी है जो दो भागों मे विभाजित पहाड़ी के उत्तरी भाग को ग्वाल टेकरी और दक्षिण भाग को मणिगिरि कहते है। यहां एक अभूतपूर्व विष्णु मंदिर है। कहा जाता है इसका निर्माण पांडवों द्वारा किया गया था। लेकिन सूर्योदय होने की वजह से मंदिर का शिखर तथा मूर्ति स्थापना का कार्य अधूरा ही रह गया। ये मंदिर भी प्राचीन शिल्पकला का उत्तम उदाहरण है।

यदि इसका जीर्णोद्धारऔर मूर्ति स्थापना का कार्य पूर्ण हो जाए तो यह भी एक नया पर्यटन स्थल बन सकता है। इस पहाड़ीमें से एक स्रोत बरसात के दिनों में निकलता हेजिसमे स्नान करने से कुष्ठ रोगियों का कुष्ठ दूर हो जाता है। ऐसी मान्यता है, कि पहाड़ी के शिखर से नर्मदा का जलस्तर 163 फीट नीचे है। पुराणों के अनुसार इन्हीं पहाडियों में प्राचीनकाल से अनेक ऋषि, मुनितपस्या करते आए है। ब्रम्हचारी विश्वनाथजी ने यहां करीब 46 वर्ष तक घोरतपस्या की। 1958 में देव लोकगमन कर गए।

काशी निवासी डीडी स्वामीजी विश्वनाथजी के गुरुभाई थे। उन्होंने भी यहां करीब सौ वर्ष तक तपस्या की। शिखर सुंदर नक्काशी एवं शबागम प्रतिमाओं से सज्जित इसमें भैरवकुंड, तांडव शिव, ब्रम्हा ब्रम्हाणी एवं महिसासुर मर्दनी प्रमुख है। मंडप की छतों पर अंदर एवं बाहर अलंकरण किया हुआ है। स्तंभो परविभिन्न आकृतियां देव देवियों के अंकन एवं पुष्पकमल की आकृतियां भी अंकित की गई है।

कहा जाता है कि यहां के शिव प्रत्यक्ष चमत्कार देखकरऔरंगजेब का सेनापति इतना अधिक दुखी हो गया कि उसने अपने पापों के प्राचश्चित हेतु अपनी प्रतिमा मंदिर के द्वारा पर उकेरवा दी ताकि भक्तजनों के पैरों से तिलतिल कर प्रक्षालन हो जाए। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर का निर्माण कौरवो ने किया था। पहले स्तंभ पूर्व दिशा की ओरथा लेकिन भीम ने अपना मंदिर पूर्ण न होने की वजह से इसका मुंह एक रात में ही घुमारकर पश्चिम की ओर करके बलात अधिकार जमा लिया।

इस मंदिर की एक और प्रमुख विशेषताओं में नींव का न होना भी है। इस मंदिर के शिखर पर भी एक मंदिर है। एवं इसी प्रकार से वर्तमान शिवलिंक के नीचे तलघर में भी एक शिव मंदिर है जिसका रास्ता भैरव गुफा से जाता है। करीब तीन फुट लंबी यह गुफा किसा समय यात्रियों को शिवलिंग तक पहुंचाने केकाम आती थी। पहाडी से पश्चिम दिशा में करीब एक किमी दूर मार्कंडेय आश्रम है।

कहा जाता है कि यहां मार्कंडेय ऋषि ने घोर तपस्या की थी। इसी स्थानपर गायत्री देवी का मंदिर भी है। इस मंदिर के नीचे एक गुफा रास्ता नदी केजलस्तर तक जाता है। इसके पश्चिम दिशा में जमदग्नि ऋषि व रेणुका देवी, पंचमुखी हनुमान व रामजानकी के मंदिर है। ये सभी पांचवीं शताब्दी केइतिहास से संबंधित है। यहां लाल पत्थर पर खुदा हुआ सूर्यरथ जमीन में धंसा हुआ अभी भी विद्यमान है।