anoop yadav wait for help

मौत से जूझ रही अनूप की जिंदगी, योगी सरकार से है मदद की आस

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– किडनी की बीमारी का 3 साल से चल रहा है ईलाज, दोनों किडनी हो गई है ख़राब 

– मजदूर किसान पिता को है सरकार से मदद की आस…

Priyesh Kumar "Prince"

प्रियेश कुमार “प्रिंस”

देवरिया, उत्तरप्रदेश। होश संभाला तो गरीबी में, दूसरे बच्चों की तरह उसके पास कुछ नया नहीं था। दुनियादारी समझने लगा तो मां-पिता ने पढ़ा-लिखा कर जिंदगी में कुछ करने के लिए ललक जगाई। परिवार को आगे बढ़ाने के लिए उस मासूम ने संकल्प लिया, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। अच्छे नंबरों से पास करने वाले गरीब अनूप यादव को किडनी के रोग ने घेर लिया। चिकित्सकों ने दोनों किडनी खराब बता दी तो मजदूर किसान पिता कोमल यादव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

जनपद देवरिया के बरहज क्षेत्र के बरछौली गाँव के रहने वाले कोमल यादव ने दोगुनी मेहनत और मजदूरी कर बच्चे अनूप यादव का उपचार करने का बीड़ा उठाया और उसकी जिंदगी को काबिल बनाने के लिए हरसंभव प्रयास किया, मगर बुरे समय ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। कड़ी मेहनत मजदूरी के बाद भी कोमल ईलाज के लिए रुपयो का इंतजाम नही कर सका और परिवार आर्थिक तंगी के चलते दूसरों पर आश्रित हो गया।

किडनी की बीमारी के चलते अनूप यादव की शारीरिक हालत ठीक नहीं है। अपने जीवन के सोलह बसन्त भी ठीक से नही देख पाए अनूप को लेकर गरीब बाप भटक रहा है। किडनी के लिए दानदाता ढूंढ़ रहा है, तो इलाज के नाम पर खर्च होने वाले लाखों रुपए जुटाने के लिए वह मजबूर है। बाप की पथराई आंखों में बेटे के ईलाज के लिये सरकार और समाज से ही आख़िरी उम्मीद है।

– हर जगह मिली गरीब परिवार को निराशा…

बेटे की दोनों किडनी के ईलाज को लेकर आर्थिक तंगी से जूझ रहे गरीब मजदूर किसान कोमल यादव अपने आप को कोसते हुए डबडबाई आँखों को पोछते हुए कहते है कि तीन साल से बेटे के किडनी का ईलाज करा रहा हूँ,लेकिन आर्थिक तंगी से लाचार हो गया हूँ अब । हमारे सामने सरकार और समाज के आगे मदद की गुहार और मनुहार करने के अलावा कोई चारा नही है।

कोमल कहते है कि मोदी और योगी सरकार से बहुत उम्मीद है हमे। लेकिन निराशा की बात यह है कि 3 साल में न सरकार से कोई मदद मिला और ना ही कभी सांसद विधायक या मंत्री ही कभी मदद को आगे आये । हमे हर सम्भव कोशिश के बाद भी निराशा ही हाथ लगी।

– अनूप बोला, वह जीना चाहता है…

इलाज को लेकर दर-दर की ठोकर खा रहे अनूप आगे की जिंदगी जीने की उधेड़बुन में डरा सहमा है। उसमें परिवार के लिए कुछ करने की ललक भी है। वह कहता है कि उसे पढऩा-लिखना है। परिवार का नाम रोशन करना है। उसके मजदूर पिता पर वह बोझ नहीं बनना चाहता। उसकी इन बातों ने लोगों को भी उसकी आंखों में झांकने को मजबूर कर दिया है।

अनूप की जिंदगी को अब ऐसे भामाशाह की जरूरत है जो उसे किडनी दिला दे और उपचार के लिए आर्थिक मदद भी कर दे।