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Elderly Remedies to grow tea leaves

बुजुर्गो ने बताए देसी नुस्खे, ‘घास’ से ‘चाय’ बना कमा रहे हजार रुपये प्रति किलो

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New Delhi: अल्मोड़ा, उत्तराखंड के गांव नौबाड़ा निवासी युवा ने कोरोना काल में हिम्मत नहीं हारी और सूझबूझ से रोजगार खड़ा किया। दान सिंह रौतेला अब पहाड़ी बिच्छू घास से जायकेदार हर्बल चाय तैयार कर हजार रुपये प्रति किलो के दाम पर बेच रहे हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियां इस उत्पाद में दिलचस्पी दिखा रही हैं।वह बताते हैं कि दिल्ली मेट्रो की नौकरी छोड़ गांव लौटा तो यह तय हो चला था कि अब रोजी-रोटी का इंतजाम भी गांव में रहकर ही करना है।

प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाने के लिए बुजुर्गो से बिच्छू घास (कंडाली) का जो नुस्खा मिला, उसने ही महासंकट को अवसर में बदल दिया। केवल दिल्ली में ही अब तक 40 किलो कंडाली हर्बल चाय बेच चुके इस नौजवान को नामी मार्केटिंग कंपनी अमेजन ने डेढ़ सौ किलो चाय की डिमांड भेजी है।

बुजुर्गो के बताए देसी नुस्खे

दान सिंह ने दैनिक जागरण से कहा, मार्च में कोरोना का सितम बढ़ा तो प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाने के नुस्खे जानने की जिज्ञासा हर किसी में जागी। मैंने भी इसे अवसर के रूप में लिया। माता-पिता और गांव के बड़े-बुजुर्गो से पता चला कि पुराने दौर में कंडाली (गढ़वाली नाम, कुमाऊं में बिच्छू घास) की सब्जी और चाय का चलन खूब था। इसमें संक्रामक रोगों को खत्म करने की ताकत मानी जाती थी। इसी नुस्खे से कोरोना को मात देते हुए स्वरोजगार का हथियार बनाने की ठान ली।

राजधानी दिल्ली में हर्बल टी की मांग लगातार बढ़ रही

दान सिंह ने जून के पहले सप्ताह में कंडाली से हर्बल चाय बनाकर बाजार में उतार दी। राजधानी दिल्ली में हर्बल टी की मांग लगातार बढ़ रही थी, जहां उन्हें थोक खरीदार मिल गए। वह बताते हैं कि बीते दिनों ही अमेजन कंपनी ने उन्हें डेढ़ सौ किलो हर्बल चाय तैयार करने का ऑर्डर दिया है। पखवाड़े भर में वह इसकी खेप दिल्ली भेज देंगे। उन्हें इस हर्बल चाय की कीमत एक हजार रुपये प्रतिकिलो मिल रही है।

 बढ़ जाती है चाय का जायका और गुणवत्ता

दान सिंह ने कंडाली की हर्बल चाय बनाने के लिए इसमें तुलसी, तेजपत्ता और अमरूद की पत्तियों के अलावा लैमनग्रास भी मिलाई है। यह सभी चीजें स्थानीय स्तर पर उपलब्ध भी हैं और इससे चाय का जायका और गुणवत्ता बढ़ जाती है। खेत और जंगल से कंडाली की पत्तियों को चुनकर लाते हैं। धूप में तीन दिन तक सुखाते हैं। फिर तना आदि अलग कर पत्तियों को हाथ से ही मसलकर थैलियों में पैक किया जाता है, जो लंबे समय तक सुरक्षित रहती हैं। उन्होंने बताया कि उनका यह कारोबार चलने लगा है। हर्बल चाय की मांग बढ़ रही है।

लागत न के बराबर

थोक कारोबारियों से पर्याप्त ऑर्डर मिल रहे हैं। हाल ही अमेजन ने भी बड़ा ऑर्डर दिया है। इस चाय का दाम एक हजार रुपये प्रति किलो है। पहाड़ और जंगलों से घास चुनते हैं। उसे सुखाकर और कुछ अन्य चीजें मिलाकर पैक करते हैं। लागत न के बराबर है। फिलहाल ऑनलाइन बिक्री कर रहा हूं। बाद में कंडाली हर्बल टी ब्रांड के रूप में कारोबार बढ़ाने की योजना है। स्थानीय ग्रामीणों को भी स्वरोजगार से जोड़ेंगे।

-दान सिंह रौतेला, नौबाड़ा गांव