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बॉलीवुड की स्त्री-निर्देशकों का अपना संसार

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Nikhil Vidyarthi

निखिल विद्यार्थी

मुंबई फिल्म इंडस्ट्री लम्बे वक्त तक पुरुष-निर्देशकों के अभिव्यक्ति के छाँव तले रहने की आदि रही। फिल्म जगत में महिला निर्देशकों के स्थापित होने में काफी समय लगा, लेकिन अब फिल्म इंडस्ट्री में महिला निर्देशकों की एक फ़ौज अपने कामों में मशरूफियत को लेकर चर्चा में रहती हैं।

पश्चिमी फिल्म उधोग के वनिस्पत बॉलीवुड में काफी वक्त के बाद भारतीय दर्शक स्त्री-निर्देशकों के प्रबुद्ध संसार से रूबरू हुए। इन अधिकांश महिला-निर्देशकों ने स्त्री-जीवन और उसकी विसंगतियों को अपनी अपनी दृष्टिकोण से देखा और समझा। जो जाहिरी तौर पर परदे पर पुरुष-दृष्टिकोण से बिलकुल भिन्न था।

हिंदी सिनेमा की पहली महिला-निर्देशक फातिमा बेग़म थी जिनकी फ़िल्मी करियर 1926 में शुरू हुई। उनके बाद सई परांजपे, अरुणा राजे, अपर्णा सेन आदि जैसी नाम फलक पर उभरी। लेकिन हाल के वर्षों में युवा महिला-निर्देशकों ने बॉलीवुड की ज़मीन पर जड़ें बुलंद करने में लगी हैं।

अब फिल्म निर्माण निर्माण तक ही सिमित नही रह गया है, बल्कि वितरण और प्रचार-प्रसार, मार्केटिंग से जुड़ा विषय भी बन गया है, और आज की महिला-निर्देशक इन सभी पक्षों में खुद रूचि लेती हैं और फिर फिल्म का निर्माण करती हैं।

महिला-निर्देशकों की पहली कतार में कल्पना लाज़मी, अरुणा राजे, फराह खान और तनूजा चंद्रा हैं। तनूजा चंद्रा ने ‘दुश्मन’ ‘संघर्ष’ ‘सुर – द मेलोडी ऑफ़ लाइफ’ जिंदगी रॉक्स में चुस्त निर्देशक के रूप में लोहा मनवाती हैं। मेघना गुलज़ार भी बॉलीवुड की प्रमुख संवेदनशील महिला-निर्देशकों में आती हैं। मेघना ने 2002 में ‘फिलहाल’ नाम की फिल्म बनायी और इसके पांच साल बाद ’जस्ट मैरिड’।

इनकी हालिया रिलीज फिल्म सच्ची और दहला देने वाली आरुशी मर्डर केस पर आधारित फिल्म ‘तलवार’ है जो 2015 में बनी। इस क्रम में जोया अख्तर का नाम न लेना भूल होगी जिनकी ‘लक बाई चांस’ और ‘जिंदगी न मिलेगी दोबारा’ को दर्शकों तथा आलोच्ज्कों द्वारा काफी सराहा गया। गौरी शिंदे का सपना फिल्म निर्देशक बनने का था जिसे उन्होंने 2012 में फिल्म ‘इंग्लिश विंग्लिश’ से पूरा किया।

विश्व सिनेमा स्तर की बात करें तो मीरा नायर, मंजू बरुआ और दीपा मेहता ने अपनी छाप छोड़ी वही दूसरी ओर किरण राव, रीमा कागती, राजश्री, अनुषा रिजवी के नाम गंभीर फिल्मों के साथ सिनेमा-पटल पर हैं। इन सभी महिला-निर्देशकों ने अपनी फिल्मों में अनूठी स्क्रिप्ट और सधी हुई निर्देशन से कम समय में ही फिल्म माध्यम में अपनी एक अलग मुकाम हासिल किया है।

पत्रकार से फिल्म-निर्माण के क्षेत्र में आई भावना तलवार अपनी एक अनूठी स्क्रिप्ट के साथ 2007 में ‘धर्म’ नाम से एक फिल्म बनाई। इस फिल्म को राष्ट्रिय एकता को प्रचारित करने वाली फिल्म मानते हुए बेस्ट फिल्म ऑन नेशनल इंटीग्रेशन का नर्गिस दत्त पुरस्कार दिया गया।

गुवाहाटी में जन्मी रीमा कागती ने पहले निर्देशकिये की हर पहलू को समझने की कोशिश करती हैं। फरहान अख्तर, हनी इरानी, मीरा नायर, आशुतोष गोवारिकर जैसे दिग्गज को असिस्ट कर अपनी निर्देशकीय पारी शुरुआत करती हैं। इसी तरह दीपा भाटिया ने ‘हजार चौरासी की माँ’, ‘तक्षक’, मैंने गाँधी को नही मारा’ ‘रॉक ऑन’ आदि फिल्मों में सहायक निर्देशिका के रूप में काम किया।

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