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Rajesh khana

विशेष: जिंदगी के सफर में गुजर जाते है जो मुकाम…वह फिर नहीं आते

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राजेश खन्ना के जयन्ती (29 दिसम्बर) पर विशेष…

Pankaj Pandey

पंकज पाण्डेय

मनोरंजन डेस्क। एक गुमनाम से चेहरे का रातों-रात सुपरस्टार बन जाना। प्रसिद्धि ऐसी की जो आज तक किसी को नहीं मिली। ऊँचाई इतनी की चढ़ने वाला हांफ कर बैठ जाए। हर किसी की वश की बात नहीं है उन बुलन्दियों को छू पाना। एक दौर था…जब एक के बाद एक लगातार उनकी फिल्में सुपरहिट हो रही थी।

घर के बाहर उनकी एक झलक पाने के लिए लाखों प्रशंसक घण्टों खड़े रहते थे, निर्माताओं की लंबी कतार,अपनी फिल्म में अभिनय करने के लिए मुहँ मांगी कीमत देने को तैयार, लड़कियों के खून से लिखे पत्र, कइयों का उनकी फोटों से विवाह रचा कर जिंदगी भर शादी न करने की कसम खाना…किसी फिल्म के दृश्य-सा लगता है यह सब। पर यह किसी फिल्म का दृश्य नहीं एक सच्चाई है जिसे लोगों ने 70 के दशक के उत्तरार्द्ध में देखा। हिंदी फिल्मों के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना के रूप में।

Rajesh khana

Janmanchnews.com

फ़िल्म फेयर माधुरी टैलेंट हंट प्रतियोगिता से चुनकर आए चौबीस वर्षीय जतिन खन्ना मुम्बई की मायानगरी में आए। सन् 66 में चेतन आनंद की फ़िल्म “आखिरी खत” से फ़िल्म संसार में दस्तक दी। एक नवजात बच्चे के सड़क पर अपनी माँ को ढूंढने की कहानी पर बनी यह फ़िल्म सफल नहीं हुई पर इसमें काम करने वाले अभिनेता को निर्माताओं-निर्देशकों ने नोटिस जरूर लिया। 67  में “राज” और “बहारों के सपने” ने इन्हें फिल्मी दुनिया में पांव रखने की जमीन दी। इन फिल्मों ने पहचान तो दी पर सफलता अभी तक नहीं मिली थी।

69 में शक्ति सामंत की फ़िल्म “आराधना” रिलीज हुई। जिसमे अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ट्रैन से जा रही है और पटरी के समांतर बनी सड़क पर एक जीप पर अपने दोस्त सुजीत कुमार के साथ माउथ ऑर्गन बजाते और गीत  गाते “मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू” दृश्य और गीत ने ऐसी लोकप्रियता अर्जित की कि गुमनाम अभिनेता रातों-रात सुपरस्टार बन गया।

लोगों की भीड़ से बचने के लिए उसे पुलिस सुरक्षा लेनी पड़ी, घर के बाहर पहरा लगवाना पड़ा। इसी वर्ष “दो रास्ते” और “इतिफाक” की सफलता ने उसे इतनी ऊँचाई पर खड़ा कर दिया जहाँ देखने पर सिर चकराने लगे।

राजेश खन्ना की सफलता ने पूर्व के लोकप्रिय अभिनेता राजकपूर, देवानन्द,राजेन्द्र कुमार,दिलीप कुमार जैसे दिग्गज अभिनेता को अपनी चकाचौंध से फीका कर दिया। बदलाव सिर्फ यहीं नहीं हुई दिग्गज संगीतकार शंकर-जयकिशन, हेमन्त कुमार,और नौशादके संगीत की सुर कहीं दूर खो गई।

मुहम्मद रफ़ी, मुकेश और मन्ना डे आदि के स्वर फीके पर गए। बस उस समय अगर कोई सफलता के आकाश में चमक बिखेर रहा था तो वे थें। गायक किशोर कुमार और संगीतकार आरडी वर्मन। हर चीज बदल चुका था। फिल्मों का पुराना दौर समाप्त होकर एक नए युग का आगाज हो चुका था। एक के बाद एक लगातार 27 सुपरहिट फिल्म की लाइन लग गई थी। आज की तरह न तो यातायात के साधन सुलभ थे और न ही महिलाओं का घर से बाहर निकलना। इतने सिनेमा हॉल भी नहीं थे। न ही था प्रचार का इतना साधन। फिर भी गांव से बैलगाड़ियों में,रिक्शा पर बैठकर पर्दानशीं महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग,विद्यार्थी की भीड़ सिनेमा हॉल में जाकर उनकी फिल्में देखते।

एक ऊँचाई पर पहुंचकर ठहरना पड़ता है। दिन के उजाले के बाद स्याह काली रात आती है। एक दौर के बाद दूसरा दौर शुरू होता है। राजेश खन्ना का दौर भी खत्म होने लगा। “आराधना” ,”खामोशी”, “अमर प्रेम”, “सफर”, “आनन्द”, “बावर्ची”,”नमक हराम”, “कटी पतंग” जैसे फिल्मों के बाद “जोरू का गुलाम”, “महबूबा”,”रेड रोज” जैसी एक के बाद एक असफल फिल्मों का दौर शुरू हुआ तो अनवरत चलता रहा। घर के बाहर लगने वाली भीड़ कम होने लगी,निर्माताओं कतराने लगे, दर्शक अब उनके एक्टिंग से बोर होने लगे।

बेरहम जनता बदलते हुए फैशन की तरह अपने सुपरस्टार को बदल दी। हर और सन्नाटा,एकाकीपन, परिवार का विखराव। एक कलाकार की मौत सांस बन्द होने से नहीं होती। उसकी मौत होती है-दर्शकों की उपेक्षा से, प्रशंसकों की दूरी बना लेने से। भले राजेश खन्ना की मौत तारिख के लिहाज से 18 जुलाई 2012 को हुई,पर वह मर चूके थे बरसों पहले। 

एक फ़िल्म सरीखे रही राजेश खन्ना की  जिंदगी। अर्श से फर्श तक का सफर…सफलता के दिनों की यादें…खो देने की कसक..फिर से उसे पाने की जद्दोजहद…याद आ रही है उनपर ही फिल्माये गए एक गीत….जिंदगी के सफर में गुजर जाते है जो मुकाम, वे फिर नहीं आते।

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