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एससी-एसटी एक्ट पर हर दल नफा और नुकसान का लगा रहा है हिसाब

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Moinul Haque

मोईनुल हक़ नदवी

विचार। एससी-एसटी एक्ट को लेकर भारत बंद में जिस तरह से लोग स्वात: स्फुरत्तिक ढंग से सड़कों पर उतरे, उसने राजनीतिक प्रेक्षक को चौकाया है। दरअसल भारत बंद को लेकर बहुत प्रचार देखने में नहीं आया था।

बहुत कम समय में लोग सड़कों पर उतरे। देश में किसी एक सवाल पर दलितों में ऐसी एकता वर्षों बाद देखी जा रही है। उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक दलित संगठन एससी-एसटी एक्ट को कमज़ोर करने के खिलाफ सड़कों पर उतरे। सड़कों पर उतरने वाले की संख्या पर चर्चा करके या यह देखकर की बंद की वजह उन्हें ठीक ठाक से मालूम है या नहीं। इसी जैसी बातों से राजनीतिक गंभीरता का कोई अंदाज़ा लगाता है, तो वह भ्रामक नतीजे पर पहुंच सकता है।

इस सवाल पर कितनी संख्या में दलित सड़कों पर उतरे, यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि इस सवाल पर उनके बीच अभूतपूर्व एकता पैदा हुई है। राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे है कि इस सवाल पर उनकी नाराजगी व्यापक है। इसीलिए हर दल इस सवाल पर दलितों के साथ दिखना चाह रहा है। सभी दल इस बात का हिसाब भी लगा रहे हैं कि इस मुद्दे के आगे बढ़ने पर किसे नुकसान होगा और किसे लाभ।

पिछले 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने जैसे ही एससी-एसटी एक्ट पर अपना फैसला सुनाया कि इस कानून का बेजा इस्तेमाल किया जा रहा है। इसीलिए मामला दर्ज होने पर तुरंत गिरफ्तारी नहीं होगी।

मामला सामने आते ही कांग्रेस पार्टी ने आगे बढ़कर इस मामले पर संवाददाता सम्मेलन करके भाजपा और प्रधानमंत्री को घेरने की कोशिश की। कांग्रेस ने मांग की कि भाजपा इस इस फैसले पर अपना पक्ष स्पष्ट करें। कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने ठीक से अपना पक्ष नहीं रखा। इसके बाद एक-एक करके दलित संगठन आगे आने लग। तुरंत ही देश भर से प्रतिकिर्या आने लगी।

(ये लेखक के अपने विचार है।)