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होली मनाएंगे… रंग उड़ायेंगे, पर उससे पहले अपने अंदर की विकृतियों को होलिका में जलाएंगे: नम्रता कमलिनी

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Rambihari pandey

रामबिहारी पांडेय

सीधी। होली एक अविस्मरणीय पल… रंग और उमंग तो एक प्रतीक है। मूल तो विसर्जन की प्रक्रिया है। समस्त बुराइयों को विसर्जित करने की तथा प्रेम पूर्ण जीवन निर्माण कर शक्ति को जन्म देने की एक सुंदर प्रयास ही होली है। हो.ली. अर्थात किसी का हो लेना किसी का हो लेने में जीवन में संघर्ष है, अत्यधिक तकलीफ है, पर ईश्वर की ओर हो लेने में जीवन का परमानंद है।

होली की शुरुआत भी शक्ति और जघन्य अपराध के मर्दन से प्रारम्भ है। भगवान की शक्ति से भक्त की हर पल रक्षा होती रहती है। पर ऐसी भावना का होना भी आवश्यक है। भक्त प्रह्लाद सूचक है, इस रंग उत्सव के, वो परिचायक है इस रंग उत्सव के प्रह्लाद की भक्ति गजब की प्रेरणा सत्य की जीत अपराध की समाप्ति।

हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को वरदान है, न समाप्त होने का फिर भी होलिका समाप्त हो जाती है ।कारण प्रह्लाद की भक्ति…ये बहुत पुरानी कहानी..यहीं से भक्ति की शुरुआत और आज के मनुष्य को संदेश कि बुरा करोगे तो वरदान ही क्यों ना हो, अभय दान ही क्यों ना हो तुम समाप्त हो जाओगे…अपनी बुराई के कारण और यदि तुम सामर्थ्यवान ना भी हो तो तुम पर सत्य पथ पर अग्रसर हुए तो भक्ति तुम्हारी रक्षा कवच के रुप में हर पल तुम्हारे साथ नारायण हर पल हर जगह स्थापित है पर तुम विस्मृति में हो… तुम समृति में आओ… अपनी प्रेरणा शक्ति का सदुपयोग करो, जीवन को सुंदर रुप दो।

होलिका दहन के दिन मन में संकल्प लो अपनी बुराई को मारने का और जब मार ल भस्म कर लो तब तुम सही मायने में रंग लगाओ, गुलाल उड़ाओ.. सारी बातें सारे तीज-त्योहार आज सिर्फ परंपराओंमें सिमट के रह गया है। मूल समाप्त है।

मूल से परिचय भी नहीं आज के जन-मानस का। क्यों मनाते हैं कोई त्यौहार इसका मूल अर्थ क्या है? क्यों शुरु हुआ ये ज्ञात होना चाहिए अन्यथा एक दिन सब खो जाएगा। हमारे भारतीय संस्कृति में किसी भी चीज की शुरुआत बड़ी सार्थकता सिद्धि के लिए की गई है। लेकिन, समय के अंतराल के साथ-साथ विचारभाव में परिवर्तन और मूल का खोज जारी है। 

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