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सीयूएसबी द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन

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कैम्पस कॉर्नर,

भारतीय भाषा केंद्र द्वारा आयोजित  “अस्मिता मूलक साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र’ विषयक संगोष्ठी का उद्घाटन हुआ. संगोष्ठी में देश के विभिन्न हिस्सों से सैकड़ो प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया. इस संगोष्ठी का उदघाटन दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति प्रो. ओमप्रकाश राय ने किया.

संगोष्ठी में विशिष्ट वक्ता के रूप में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य और प्रसिद्ध बहुजन बुद्दिजीवी प्रो चौथीराम यादव ने संगोष्ठी के बीजवक्तव्य में बोलते हुए कहा कि ‘स्थापित सौन्दर्यशास्त्र को अस्मितावादी चुनौतियाँ’ के विभिन्न सन्दर्भों को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि प्रेमचंद मुक्तिबोध से पहले साहित्य का स्वरूप कलावादी रहा है. आज का हिंदी साहित्य संस्कृत का साहित्य और पश्चिम के एस्थेटिक्स के काकटेल से अभी का सौन्दर्यशास्त्र बना है. कबीर और रैदास की बात करते हुए उन्होंने कहा कि रैदास का साहित्य अस्मिता के सौन्दर्य को आधार प्रदान करता है.

इसी उद्घाटन सत्र में महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय से आई प्रसिद्ध स्त्रीवादी आलोचक और कहानीकार प्रो रोहिणी अग्रवाल ने कहा कि अस्मिता अपने आप को जीवंत रूप प्रदान करने का नाम है. इसमें हम परम्परा का निषेध नहीं करते बल्कि परम्परा में जो ग्राह्य है उसे ग्रहण कर जो त्याज्य है उसे त्यागते हैं.

प्रसिद्ध वामपंथी आलोचक प्रो वीरेंद्र यादव ने मुक्तिबोध को कोट करते हुए कहा कि ‘ब्राह्मणवादी लेखकों को मुक्तिबोध का लेख प्रेत के रूप में लगता है यही कारण है कि लोग कबीर को पढने से डरते हैं. कार्यक्रम में सेवानिवृत जज  जवाहर लाल कॉल “ व्यग्र “  ने  कहा की जात – पात और  छुआ-छूत तभी ख़त्म होगा जब जातिविहीन समाज  कि स्थापन होगी और तभी उनका सौंदर्यशास्त्र बनेगा.

प्रसिद्ध आदिवासी लेखिका वंदना टेटे ने  इस कार्यक्रम  में बोलते हुए कहा कि जब कोई अस्मिता कह रहा होता है तो वह सामने वाले को छोटा और वंचित मान रहा होता है. हम आदिवासी लोग इस मानसिकता का विरोध करते हैं. इस सत्र का सञ्चालन डॉ. अनुज लुगुन और दूसरे सत्र का सञ्चालन संगोष्ठी सह संयोजक डॉ. कर्मानंद आर्य ने किया.

दूसरे सत्र में देश के प्रतिष्ठित भाषा विज्ञानी के तौर पर प्रमुख वक्ता के रूप में बोलते हुए प्रोफेसर राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने कहा कि साहित्य के समय निर्धारण के लिए शब्दों का सफर जानना बहुत जरुरी. साहित्य में प्रमाणिकता के लिए कार्बन डेटिंग प्रणाली बहुत कारगार साबित हो सकती है. शब्द वाक्य और उसकी बुनावट से समझा जा सकता है कि कि यह किस उम्र और समय के लोगों द्वारा बोली गई है.

इसी सत्र में बोलते हुए डॉ. हरिनारायण ठाकुर ने कहा कि आज का समय अस्मिता का समय है और रचनात्मक साहित्य में अस्मिता की पहचान बहुत जरुरी हो चला है. कार्यक्रम देश के कई राज्यों से प्रतिभागी शामिल रहे. अनिताभारती, जय प्रकाश फ़क़ीर, प्रो केके नारायण, कृष्णकुमार सिंह, डॉ. सतेन्द्र, रंजीत कुमार सिन्हा, डॉ. रवीन्द्र कुमार पाठक, डॉ. योगेश, डॉ. कफील, डॉ. शांतिभूषण, आनंद पटेल, सरस्वती मिश्रा, प्रियंका, निक्की आदि बहुत सारे प्रतिभागी और छात्र उपस्थित रहे.