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how herd immune is good or bad

तो क्या कोरोना संक्रमण के लिए काल बनेगी हर्ड इम्युनिटी!

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New Delhi: दुनिया के कई हिस्सों में किए गए एंटीबाडी सर्वे बताते हैं कि वहां कोरोना पीड़ितों की जितनी संख्या बताई जा रही है, उससे कहीं ज्यादा उनकी संख्या है। इस आधार पर माना जा रहा है कि वहां सामूहिक प्रतिरक्षा (हर्ड इम्युनिटी) या विकसित हो चुकी होगी या फिर उसके करीब होगी। ऐसा ही एक अध्ययन देश की राजधानी दिल्ली में भी हुआ जिसमें सामने आया कि यहां करीब एक चौथाई आबादी यानी 40 लाख लोग इस महामारी के चपेट में आकर ठीक भी हो गए और उन्हें इसका इल्म नहीं हुआ। विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली संक्रमण के शीर्ष पर पहुंचकर ढलान की ओर बढ़ चली है। ऐसा ही अनुभव न्यूयार्क के साथ रहा। आइए जानते हैं कि क्या जितने लोगों में प्रतिरक्षा प्रणाली विकसित होगी, उतनी ही तेजी से यह महामारी खत्म होगी।

शीर्ष पर पहुंचने के मायने: कोविड-19 महामारी के शीर्ष का मतलब यह बिल्कुल भी नहीं है कि इसके बाद यह बीमारी खत्म हो जाएगी, बल्कि इसका मतलब होता है कि रोजाना आने वाले नए मामलों की संख्या में कमी का ट्रेंड दिखना शुरू हो जाएगा। हालांकि इसकी लगातार कम होने की अवधि का कोई अंतरराष्ट्रीय मानक नहीं तय किया गया है लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार अगर लगातार सात दिन तक नए मामलों की संख्या में गिरावट दिखती है तो माना जा सकता है कि उस स्थान में कोरोना का पीक पीछे छूट चुका है। कुछ विशेषज्ञ लगातार कम होने की अवधि को 14 दिन के आधार पर विचार करने की बात करते हैं। इसकी वजह नए कोविड केस के 14 दिन का संक्रमण काल होना माना जाता है। इसका मतलब संक्रमित व्यक्ति में 14 दिन तक कोई लक्षण नहीं भी दिखाई दे सकते हैं। न्यूयार्क में रोजाना के नए केसों में उल्लेखनीय गिरावट मध्य मई के बाद शुरू हुई। शहर को जून में खोला जाना शुरू किया लेकिन पहले की तरह नए मामले नहीं सामने आए।

शीर्ष का निर्धारण करने वाले कारक: जब वायरस रोजाना चंद लोगों को ही अपनी चपेट में लेने पर सीमित हो जाए तो समझा जाना चाहिए कि पीक पीछे छूट चुका है। हालांकि इस स्थिति को यह नहीं माना जाना चाहिए कि महामारी खत्म हो गई। इसमें केवल नए मामलों की लगातार घटती संख्या सामने आएगी। यह घटती संख्या एक तो लाकडाउन और शारीरिक दूरी के नियमों के अमल के चलते हो सकती है जिससे वायरल ज्यादा लोगों को अपने चपेट में नहीं ले पाता है। दूसरी वजह के तहत वायरस ने उस स्थान की बड़ी आबादी को संक्रमित कर रखा हो और सीमित संख्या में ही गैरसंक्रमित लोग बचे हों। यही हर्ड इम्युनिटी का परिदृश्य है।

दूसरी लहर की बात: दुनिया के अधिकतर हिस्सों में अनलाक होने से वायरस के संक्रमण की दूसरी लहर का अंदेशा जताया जा रहा है। हालांकि ऐसा कुछ अभी दिख नहीं रहा है। पुष्ट मामले आज भी कुल आबादी का एक छोटा हिस्सा ही है। लेकिन इन स्थानों पर हुए अध्ययन बताते हैं कि आधिकारिक आंकड़ों से इतर संक्रमितों की कहीं ज्यादा संख्या है। इन स्थानों में दिल्ली भी शामिल है।

हर्ड इम्युनिटी की सीमा: हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मार्क लिपिस्टिच ने फरवरी में बताया था कि जब किसी जगह की 40 से 70 फीसद आबादी संक्रमित हो जाती है तो वहां हर्ड इम्युनिटी की स्थिति बन जाती है। बाद में विशेषज्ञों ने ज्यादा परिष्कृत माडलों के आधार पर बताया कि किसी स्थान पर हर्ड इम्युनिटी 20 फीसद पर भी विकसित हो सकती है। स्टाकहोम यूनिर्विसटी में मैथमेटिक्स के डीन टाम ब्रिट्टन ने अपने अध्ययन में बताया कि किसी स्थान पर 35 से 35 फीसद आबादी के संक्रमित होने पर भी हर्ड इम्युनिटी पाई जा सकती है। बाद में लिपिस्टिच ने भी अपने अनुमान को घटाकर 20 से 60 फीसद के बीच कर दिया।

तो क्या दिल्ली, मुंबई और न्यूयार्क शहरों में हर्ड इम्युनिटी की स्थित है… सीरो सर्वे में सामने आया कि दिल्ली में 20 फीसद आबादी में एंटीबाडी पाए गए। यानी करीब 40 लाख लोगों में इम्युनिटी विकसित हो गई। न्यूयार्क में 19 फीसद लोग सीरो पाजिटिव मिले हैं। मुंबई में हुए एक अध्ययन के अनुसार वहां 24 फीसद लोगों में एंटीबाडी विकसित हो गई है। हरियाणा के पांच जिलों में हुए एक छोटे सैंपल साइज सर्वे के अनुसार 12 फीसद में एंटीबाडी का बन चुकी है।