Preeti Singh Chauhan

मेक इन इंडिया या रेप इन इंडिया

219

महिलाओं के प्रति समाज में आ रहे बदलाव पर चिंतन कर रही सामाजिक कार्यकर्ता प्रीत जमींदार सिंह चौहान…

Rambihari pandey

रामबिहारी पांडेय

सीधी- भारत में दुराचार की घटनाओं पर इंसान के बदलते इंसानियत पर बदलते चरित्र ने समाज को झकझोर कर रख दिया है. जब भी बात महिलाओं के साथ हो रहे दुराचार की घटनाओं की होती है, तो ऐसी घटनाओं पर अपने तीखी टिप्पणी देने वाले लोगों और उसके कारणों पर जाने वाले लोगों पर एक विचार आत्मसात करने वाला सामने आया है.

जिसमें यह तर्क दिया जा रहा है कि यदि पहनावे के कारण महिलाएं दुराचार के शिकार हो रहे हैं, वे बालिकाएं दुराचार की शिकार कैसे हो जाती हैं. जो पूरी तरह से कपड़े से ढंकी होती है. सोच कर सोचो संगठन के संचालिका कुमारी प्रीत जमीदार सिंह चौहान ने जो तर्क दिया है. उस पर समाज को चिंतन मांग करने की जरूरत है.

आइए जानते हैं, उन्होंने मासूमों के साथ सो रहे दुराचार की घटनाओं पर जो विचार व्यक्त किए हैं. उनके अनुसार भारत में वर्तमान समय में आए दिन तमाम जगहों से ऐसे मामले सामने आ रहे है. जिन्हे देखकर और सुनकर ऐसा प्रतीत होता है कि आखिर हुआ क्या है इस समाज के लोगो को. कैसी मानसिकता हो गई है, छोटी बच्ची से लेकर 60 साल की उम्रदराज औरत तक कही भी सुरक्षित नहीं है, रोज अत्यधिक भयावह, दर्दनाक, दुष्कृत्य हो रहे है. उसके लिए आज मैं स्वयं को इतना असहाय, मजबूर, कमजोर, महसूस कर करती हूं.

ऐसा लग रहा है कि आखिर मैं इस बलात्कारी समाज का हिस्सा ही क्यों हूं.  शर्म आती है मुझे इस समाज का हिस्सा होने में, परेशान होती हूं, मैं रोज हर पल, यह सुनकर की मैं देश की बेटी हूं, घर की इज्जत हूं, मां हूं और देवी हूं, नहीं मैं हूं मैं, ये सब सुना आप सबको, सुनाई दिया या नहीं या उस बच्ची की चीख की तरह आपको ये आवाज़ भी सुनाई नही दे रही है या न सुनने का ढोंग कर रहे है ज्यादातर लोग यही तो करते आ रहे है, मैं एक इंसान हूं आपकी तरह. मेरे शरीर के कुछ अंग आपसे अलग हैं इसलिए मैं औरत हूं.

बस इससे ज्यादा और कुछ भी नहीं. उन छोटी बच्चियों ने तो फुल ड्रेस पहनी हुई थी. साहब फिर उनका बलात्कार कैसे हो जाता है. आपके अनुसार बलात्कार तो उसका होता है न जो छोटे कपड़े पहनती हैं, आप तो अंग प्रदर्शन देख कर बेकाबू होते है न, फिर आप मासूम चेहरा नन्ही सी जान देखकर भी बेकाबू कैसे हो गए, धर्म के नाम पर अपनी हवश बुझाने वालो और उनको सपोर्ट करने वालो सुन लो कल कोई नन्ही बच्ची आप के  घर से भी हो सकती है.

अगर मैं गलत नहीं हूं, तो ये वही मर्द है न जिन्हें ‘सेनेटरी नैपकिन’ देखकर शर्म आती है, इतने शर्मीले हो तो बलात्कार कैसे कर लेते हो, आप तो लड़कियों के अंडरगारमेंट्स देखकर भी शर्मा जाते हो या इन्हें देखकर आपकी सेक्सुअल डिजायर्स जग जाती है. आप बेकाबू हो जाते हो और रेप कर देते हो.

लेकिन अफसोस इस बार तो कोई ऐसा कारण भी नही था. जिससे आप ये बोलो की आप बहक गये थे अपने बचाव में, लेकिन मानना पड़ेगा आपके बेकबूपन को हर समय साथ देता है ये आप हमारी लंबी टांगे देखकर बेकाबू हो जाते है, आप एक 55 साल के औरत के लड़खड़ाते पैर को देखकर भी बेकाबू हो जाते है और तो और आप तो उस बच्ची के नन्हे नन्हे पैरों को देखकर भी बेकाबू हो गए, अब इसमें भला आपकी क्या गलती है मर्द जाति है फिसल गये होंगे.

जरा सोचिए हम कहां जा रहे है, यह सोचने से पहले ये सोचिये की हम कहां आ पहुंचे हैं, जरा रुक कर देख लेना चाहिए इस दुष्कृत्य को वेसे तो इस घिनोने कृत्य के लिए बलात्कार जैसे शब्द भी कम लग रहे हैं, आज मुझे यकीन हो रहा है कि मैं मरे हुए समय में समाज में जीने का भरम पाल रखी हूं.

और यही नहीं, अफ़सोस अब न तो कोई धर्मगुरु और न ही कोई मौलाना साहब अपनी टिप्पणी देने आते है कि हा उन बच्चियों के साथ गलत हुआ. बाकी नेतागिरी के लिए लाइमलाइट में आने के लिए हमेशा ही तत्पर रहते हैं और नेता लोगो से कुछ उम्मीद तो है नहीं इस मामले में और कितना करोगे बता दो आज कितना गिरोगे, हम भी तो तैयार हो जाये इस बार सहने के लिए नहीं ?

आपका मुंह तोड़ जवाब देने के लिए तकलीफ़ होती है, बेचैनी होती है ये सब सुन कर, देख कर, नहीं सहा जाता अब, आखिर कब तक ऐसे दरिंदे घूमते रहेंगे कब तक? मुझमे में में रहने दो प्लीज़. एक और बात बोलनी थी- औरतो से लेकर बच्चियों तक आ गए मर्द जात तुझे तरक्की मुबारक़ हो…