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Phulan Devi

जनमंच विशेष: बीहड़ से लेकर संसद तक….जिस पर फ़िल्म भी बनी ‘फूलन देवी’

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Mithiliesh Pathak

मिथिलेश पाठक

जनमंच विशेष। किसी ज़माने में दहशत का दूसरा नाम, जिसका नाम सुन कर लोगों के रोये खड़े हो जाते थें, जिसकी कम उम्र में हुई थी शादी, फिर गैंगरेप और फिर इंदिरा गांधी के कहने पर सरेंडर। इस दस्यु सुंदरी का नाम है फूलन देवी…।

जिसके डकैत बनने की पूरी कहानी किसी के भी रोंगटे खड़े कर देने के लिए काफी है। यूं तो फूलन देवी पर आपने बहुत कुछ पढ़ा, जाना, सुना होगा लेकिन आज हम आपको फूलन देवी के बंदूक थामने के पीछे की कहानी बता रहे हैं। आप भी जानिए ‘बैंडिट क्वीन’ से सांसद बनने तक का सफर फूलन देवी की कहानी….

फूलन देवी का जन्म 10 अगस्त 1963 को निचले कुल में उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव गोरहा का पूर्वा में एक मल्लाह के घर हुअा था। फूलन देवी की शादी मात्र ग्यारह साल की उम्र में हुई थी। लेकिन उनके पति और पति के परिवार ने उन्हें छोड़ दिया था। बहुत तरह की प्रताड़ना और कष्ट झेलने के बाद फूलन देवी का झुकाव डकैतों की तरफ हुआ था। धीरे धीरे फूलनदेवी ने अपना खुद का एक गिरोह खड़ा कर लिया और उसकी नेता बनीं।

Phulan Devi

File Photo: फूलन देवी

गिरोह बनाने से पहले गांव के कुछ लोगों ने फूलन के साथ दुराचार किया था। फूलन इसी का बदला लेने की आग दिल मे लिए डकैत बन गई और उसने बीहड का रास्‍ता अपना लिया। डकैत गिरोह में उसकी सर्वाधिक नजदीकी विक्रम मल्‍लाह से बताई जाती है, ऐसा माना जाता है कि पुलिस मुठभेड में विक्रम की मौत हो गई जिसके चलते फूलन टूट गई।

आमतौर पर फूलनदेवी को डकैत के रूप में गरीबों का मदगार समझा जाता था। बसे पहली बार (1981) में वे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियों में तब आई जब उन्होने ऊँची जातियों के बाइस लोगों का एक साथ नरसंहार किया जो छत्रिय जाति के बड़े लोग थे। लेकिन बाद में उन्होने इस नरसंहार से इन्कार किया था।

इसके बाद में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सरकार तथा प्रतिद्वंदी गिरोहों ने फूलन को पकड़ने की बहुत सी नाकाम कोशिशे की। परन्तु सफल नहीं हो पाई। इंदिरा गाँधी की सरकार ने 1983 में उनसे समझौता किया कि उसे मृत्यु दंड नहीं दिया जायेगा, और उनके परिवार के सदस्यों को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया जायेगा। जिसपर फूलनदेवी ने इस शर्त के तहत अपने दस हजार समर्थकों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।

बिना मुकदमा चलाये ग्यारह साल तक जेल में रहने के बाद फूलन को 1994 में मुलायम सिंह यादव की सरकार ने रिहा कर दिया। ऐसा उस समय हुआ जब दलित लोग फूलन के समर्थन में गोलबंद हो रहे थें और फूलन इस समुदाय के प्रतीक के रूप में देखी जाती थी। फूलन ने अपनी रिहाई के बौद्ध धर्म में अपना धर्मातंरण किया। 

1996 में फूलन ने उत्तर प्रदेश के भदोही सीट से लोकसभा का चुनाव जीता और बीहड़ के डकैत संसद में पहुँची। 25 जुलाई सन 2001 को दिल्ली में उनके आवास पर फूलन की हत्या कर दी गयी। उसके परिवार में सिर्फ़ उसके पति उम्मेद सिंह हैं।

1994 में शेखर कपूर ने फूलन पर आधारित एक फिल्म बैंडिट क्वीन बनाई जो काफी चर्चित और विवादित रही। फूलन ने इस फिल्म पर बहुत सारी आपत्तियां दर्ज कराईं और भारत सरकार द्वारा भारत में इस फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगा दी गयी। फूलन के साथ जमिदारों ने बलात्कार किया था।

Bandit Queen

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दिल्‍ली के तिहाड़ जेल में कैद अपराधी शेर सिंह राणा ने फूलन की हत्‍या की। हत्‍या से पहले वह देश की सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली तिहाड़ जेल से फर्जी तरीके से जमानत पर रिहा होने में कामयाब हो गया। हत्‍या के बाद शेर सिंह फरार हो गया।

कुछ समय बाद शेर सिंह ने एक वीडियो क्‍िलप जारी करके अंतिम हिन्‍दू सम्राट पृथ्‍वीराज चौहान की समाधी ढूढंकर उनकी अस्थियां भारत लेकर आने की कोशिश का दावा किया। हालांकि बाद में दिल्‍ली पुलिस ने उसे पकड़ लिया। फूलन की हत्‍या का राजनीतिक षडयंत्र भी माना जाता है। उसकी हत्‍या के छींटे उसके पति उम्‍मेद सिंह पर भी आए। हालांकि इस मामले में पति उम्‍मेद आरोपित नहीं हुआ था।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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