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सम्भव है कोरोना महामारी का पर्यावरणीय उपाय: डॉ. सुधीर

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जौनपुर, उत्तर प्रदेश। प्रतिपल परिवर्तन प्रकृति का नियम है। इस प्रकृति में जो भी जीवधारी हैं, चाहे मनुष्य ही क्यों ना हो, उनके जनसंख्या का नियंत्रण और संरक्षण प्रकृति खुद करती है। इसको प्रकृति के ऑटो करेक्ट मेकैनिज्म (स्वचालित तंत्र) और पारिस्थितिक होमियोस्टैसिस से समझा जा सकता है।

दुनिया के कई वैज्ञानिक जैसे योद्धा ने अधिकतम जनसंख्या बढ़ने के बाद जनसंख्या अपने आप घटने लगती है। इस शोध के आधार पर सेल्फ थिनिंग का सिद्धांत दिया। प्रकृति द्वारा रचित पारिस्थितिक तंत्र के ट्रॉफिक लेवल को ही देख लिया जाए। सभी ट्रॉफिक लेवल की प्रजाति अपने से नीचे वाली प्रजाति के ऊपर भोजन को लेकर के निर्भर करती है, जो पृथ्वी पर जीवित जीवों के बीच सबसे मजबूत इंटरेक्शन है।

उदाहरण के तौर पर जैसे शेर बकरी को खा सकता है। यह इंटरेक्शन बकरी और शेर का तो सदियों से है, पर क्या बकरियों की संख्या पूरी तरह खत्म हो गई? या शेरों की संख्या पूरी तरह बढ़ गई? इसका मतलब कहीं न कहीं ट्रॉफिक लेवल के भी नियम में संरक्षण का सिद्धान्त है।

ठीक इसी तरह आज वैश्विक स्तर पर जो करोना से समस्या हो रही है। जिसमें COVID-19 से मनुष्य का इंटरेक्शन है। अधिकाधिक जनसंख्या संक्रमित हो रही है। मृत्यु को प्राप्त हो रही है। समूचे विश्व के सामने यह प्रश्न है की क्या ऐसे ही चलता रहेगा? ऐसा नहीं है, इसका भी एक समय है, एक चक्र है, इसे रुकना ही होगा, नहीं तो प्रकृति का संरक्षण सिद्धान्त समाप्त हो जाएगा।

वर्तमान में सम्पूर्ण विश्व कोरोना महामारी के दुष्प्रभाव का कोई वैज्ञानिक ठोस उपचार नहीं कर पा रहा है। जिससे मृत्यु दर में लगातार बृद्धि हो रही है। लगभग 100 साल पहले 1918-1919 के समय में स्पेनिश फ्लू के चलते महामारी आई थी और उस समय पूरे विश्व में लगभग 5 करोड लोगों की मौत हुई। उस समय भी न कोई दवा थी। नाही उचित उपचार था, लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग का ही सहारा लेना पड़ा। यह बात सोचने वाली है, उस समय के लोगों में जब यह महामारी फैली होगी तो यह जरूर सोच आई होगी कि अब तो पूरी दुनिया खत्म हो जाएगी। मानव सभ्यता खत्म हो जाएगी, पर ऐसा हुआ नहीं, कहीं न कहीं प्रकृति के संरक्षण का नियम काम करता है।

अब जब कोई उचित उपचार नहीं है, तो मृत दर को कैसे रोका जाय? ऐसे में पर्यावरण की शक्ति को को भारतीय दर्शन के आधार पर समझना होगा। पर्यावरण से मनुष्य है, न की मनुष्य से पर्यावरण, जीवनदायिनी तत्व क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर की विशेष महत्ता है। वर्तमान में देखा जाए तो सबसे शुद्ध सूर्य का प्रकाश हैं। वायुमंडल की हवा अब पर्यावरण में लॉक डाउन के चलते शुद्ध हो रही है, ध्वनि प्रदूषण कम हुआ है। ऐसे में जीवनदायिनी तत्व निश्चित रूप से प्रकृति द्वारा बनाई हुई पारिस्थितिक तंत्र संरचना को संरक्षण करने में प्रबल होंगे।

कोरोना महामारी के दुष्प्रभाव से बचने का सोशल डिस्टेंसिंग एक उचित माध्यम है। इसका नियंत्रण तो कोरोना संक्रमण चक्र में ही है। मनुष्य में संक्रमित होने का कुल समय और संक्रमण फैलाव का एक्स्पोनेंशियल मॉडल समझना होगा। इसको साधारणतया गणित के मॉडल से समझा जा सकता है। अगर पूर्णतया सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया जाय तो इस महामारी से 56 दिनों (मात्र दो साइकिल 21+21 और 14 बफर दिवस ) में पूर्णतया निजात पाया जा सकता है।

भारत की जलवायु भी कोरोना महामारी को नियंत्रित करने के तरफ अग्रसर है, अप्रैल माह से जुलाई तक उत्तरोत्तर तापमान में वृद्धि होनी है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अभी यह प्रमाणित नहीं है की COVID-19 अधिक तापमान पर मर जाता है, लेकिन यह तो तय है कि तापमान बढ़ने पर एबायोटिक कॉन्टेमिनेशन तो निश्चित रूप से कम होगा। जिससे COVID-19 वायरस प्राकृतिक रूप से कमजोर पड़ेगा।