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सूप

मोदी के विकास को काशी से भगाने के लिए महिलाओं नें दिवाली की सुबह की तरह बजाया सूप

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काशी की संस्कृति और प्राचीन मंदिरों की कीमत पर नही चाहिए विकास…

Tabish Ahmed

ताबिश अहमद

 

 

 

 

 

 

वाराणसी: काशी विश्वनाथ कारीडोर परियोजना और गंगा पाथ वे के नाम पर पक्का महाल क्षेत्र में ढहाए जा रहे मकानों और मंदिरों की लड़ाई ने अब एक नया मोड़ ले लिया है। इन धरोहरों को बचाने के लिए सोमवार से श्री विद्यामठ के स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने मंदिर बचाओ आन्दोलन की शुरुआत की थी। इस आन्दोलन के दुसरे दिन काशी की माताओं ने विनाशकारी विकास को शहर से दूर भगाने के लिए गंगा तट पर सूप बजाया।

सूप

Women of Varanasi found a new way to kick the destructive development out of Kashi…

परम्पराओं के अनुसार दिवाली की सुबह सूप बजाकर घर की दरिद्रता को दूर भगाया जाता है पर काशी में धर्म और संस्कृति को बचने के लिए महिलाओं ने मंदिर बचाओ आन्दोलनम के दुसरे दिन गंगा तट पर सूप बजाकर विनाशकारी विकास को काशी से दूर भागने का प्रयत्न किया। इस दौरान महिलाओं ने कहा कि काशी की अंतरात्मा को छू कर कोई सत्ता में आ सकता है तो कोई हमारी अंतरात्मा को चोट पहुचाने पर इससे नुकसान में भी जा सकता है।

सूप बजाकर किया प्रदर्शन

इस सम्बन्ध में सूप बजकर काशी से विनाशकारी विकास को दूर भगा रही महिला ने बताया की जो सरकार की योजना विश्वनाथ कारीडोर योजना में जो मंदिरों का ध्वस्तीकरण हुआ है उससे काशी की आत्मा रो रही है अगर काशी की आत्मा रो रही है तो काशी का विकास कैसा, विकास के नाम पर यह कैसा विनाश चल रहा है समझ में नहीं आ रहा है।

दरिद्रता की तरह विनाशकारी विकास काशी से दूर हो

परम्परा के अनुसार सूप दरिद्रता को हटाने का द्योतक है साथ ही जो थोथी और हलकी चीजें है उन्हें वह उड़ा देता है। इसके अलावा दिवाली की सफाई के बाद जो घर की दरिद्रता बच से भी सूप घर के बाहर का रास्ता दिखाता है। कहा जाता है की लक्ष्मी और दरिद्रता सगी बहने हैं जहाँ लक्ष्मी रहेंगी वहां दरिद्रता नहीं रह सकती इसलिए दिवाली के दिन रात में ही हम सूप बजकर दरिद्रता को बहार निकाल देते हैं। उसी प्रकार आज हमने विनाशकारी विकास को काशी से बाहर का रास्ता दिखने के लिए सूप बजाया है।

विकास से ऐतराज़ नहीं पर न बदलें काशी का स्वरुप 

हमें विकास से कोई ऐतराज़ नहीं है पर जो पुराणों में वर्णित हमारी पुरानी मूर्तियाँ या मंदिर हैं वो संरक्षित हों तभी काशी कायम रहेगा। अगर आप का चेहरा बदल दिया जाएगा तो कैसे होगी उसकी पहचान। जिस गलियों की व्यख्या पुराणों में किताबों में शेरो शायरी में हैं वो मिट जाएगा तो हम क्या दिखायेंगे किसी को। क्योटो के तर्ज पर मूलभूत आवश्यकताएं जो आधुनिक होना ज़रूरी है उसका विकास करें उसमे आपत्ति नहीं है पर आस्था का परिवर्तान न करें।

मौजूदा सरकार को हो सकता है आगे नुकसान

उन्होंने यहाँ के लोगों के मर्म को छुआ और पूरा वोट ले गये। उन्होंने कहा मै आया नहीं हूँ मुझे बुलाया गया है। काशीवासी गंगा के नाम पर, विश्वनाथ मांदरी के नाम पर, संकटमोचन के नाम पर माता अन्नपूर्णा के नाम पर अपना सबकुछ न्योछावर कर सकते हैं पर इनके अस्तित्व या इनसे जुडी चीजों के रूप में बदलाव करने पर उन्हें नुक्सान झेलना होगा।