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राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता का प्रतीक महाशिवरात्रि आज

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Rajnish

रजनीश

गोपालगंज। महाशिवरात्रि पर्व फाल्गुन मास की कृष्ण त्रयोदशी को मनाया जाता है। यह व्रत सृष्टि के समस्त प्राणियों के लिए अत्यंत कल्याणकारी माना गया है, जो किसी भी धर्म-सम्प्रदाय का कोई भी व्यक्ति कर सकता है। शिवरात्रि देवों के देव महादेव अर्थात् भगवान शिव के जन्म का स्मरणोत्सव है। इस अवसर पर शिवभक्त उपवास तथा रात्रि जागरण करते हैं ताकि उनकी पूजा-अर्चना, उपासना से प्रसन्न होकर भगवान शिव की कृपा दृष्टि उन पर सदैव बनी रहे।

माना जाता है कि इसी दिन रात्रि के मध्य में जगतपिता ब्रह्मा से रुद्र के रूप में भगवान शिव का अवतरण हुआ था। यह भी कहा जाता है कि इसी दिन प्रलय की वेला में प्रदोष के समय भगवान शिव ने तांडव करते हुए समस्त ब्रह्माण्ड को अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त किया था। इसीलिए इस अवसर को कालरात्रि अथवा महाशिवरात्रि कहा जाता है।

भारत में सर्वाधिक महत्व जिस देव का है, वो देवाधिदेव भगवान शिव ही हैं। जो आज भी समूचे भारतवर्ष में उतने ही पूजनीय और वंदनीय हैं, जितने सदियों पहले। इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि देशभर में जितने मंदिर या तीर्थ स्थान भगवान शिव के हैं, उतने अन्य किसी देवी-देवता के नहीं।

आज भी समूचे देश में व्यापक स्तर पर भगवान शिव की पूजा-उपासना होती है। यही कारण है कि महाशिवरात्रि को भारत में एक राष्ट्रीय पर्व का दर्जा प्राप्त है। भोलेबाबा के रूप में सर्वत्र पूजनीय भगवान शिव को समस्त देवों में अग्रणीय और पूजनीय इसलिए भी माना गया है क्योंकि वह अपने भक्तों पर बहुत जल्दी प्रसन्न होते हैं। भोले शंकर दूध या जल की धारा, बेलपत्र व भांग की पत्तियों की भेंट से ही अपने भक्तों पर प्रसन्न हो जाते हैं तथा उनकी मनोकामना पूर्ण करते हैं।

भगवान शिव को भारत की भावनात्मक एवं राष्ट्रीय एकता व अखण्डता का प्रतीक माना गया है। जबकि महाशिवरात्रि पर्व को राष्ट्रीय सद्भावना का जीवंत प्रतीक माना गया है। भारत में शायद ही ऐसा कोई गांव मिले जहां भगवान शिव का कोई मंदिर अथवा शिवलिंग स्थापित न हो। यदि कहीं शिव मंदिर न भी हो तो वहां किसी वृक्ष के नीचे अथवा किसी चबूतरे पर शिवलिंग तो अवश्य स्थापित मिल जाएगा।

एक होते हुए भी शिव के नटराज, पशुपति, हरिहर, त्रिमूर्ति, मृत्युंजय, अर्द्धनारीश्वर, महाकाल, भोलेनाथ, विश्वनाथ, ओंकार, शिवलिंग,बटुक, क्षेत्रपाल, शरभ इत्यादि अनेक रूप हैं।

अब प्रश्न यह है कि जिस प्रकार विभिन्न महापुरुषों के जन्मदिन को उनकी जयंती के रूप में मनाया जाता है, उसी प्रकार भगवान शिव के जन्मदिन को उनकी जयंती की बजाय रात्रि के रूप में क्यों मनाया जाता है?

इसका कारण संभवतः यही है कि रात्रि को पापाचार, अज्ञानता और तमोगुण का प्रतीक माना गया है और कलियुग में क्या संत, क्या साधक, क्या एक आम मानव अर्थात् हरकोई दुखी है। अतः कालिमा रूपी इन बुराईयों का नाश करने के लिए प्रतिवर्ष चराचर जगत में एक दिव्य ज्योति का अवतरण होता है और यही शिवरात्रि है।

शिव और रात्रि का शाब्दिक अर्थ एक धार्मिक पुस्तक में स्पष्ट करते हुए कहा गया है, “जिसमें सारा जगत शयन करता है, जो विकार रहित है, वह शिव है अथवा जो अमंगल का ह्रास करते हैं, वे ही सुखमय, मंगलमय शिव हैं। जो सारे जगत को अपने अंदर लीन कर लेते हैं, वे ही करूणासागर भगवान शिव हैं। जो भगवान नित्य, सत्य, जगत आधार, विकार रहित, साक्षीस्वरूप हैं, वे ही शिव हैं। महासमुद्र रूपी शिव ही एक अखंड परम तत्व हैं, इन्हीं की अनेक विभूतियां अनेक नामों से पूजी जाती हैं, यही सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान हैं। यही व्यक्त-अव्यक्त रूप से सगुण ईश्वर और निर्गुण ब्रह्म कहे जाते हैं। यही परमात्मा, जगत आत्मा, शम्भव, मयोभव, शंकर, मयस्कर, शिव, रूद्रआदि कई नामों से संबोधित किए जाते हैं।”

धार्मिक ग्रंथों में भगवान शिव के बारे में यही उल्लेख मिलता है कि तीनोंलोकों की अपार सुन्दरी और शीलवती गौरी को अर्धांगिनी बनाने वाले शिवप्रेतों और भूत-पिशाचों से घिरे रहते हैं। उनका शरीर भस्म से लिपटा रहता है, गले में सर्पों का हार शोभायमान रहता है, कंठ में विष है, जटाओं में जगत तारिणी गंगा मैया हैं और माथे में प्रलयंकर ज्वाला है।

बैल (नंदी) को भगवान शिव का वाहन माना गया है। ऐसी मान्यता है कि स्वयं अमंगल रूप होने पर भी भगवान शिव अपने भक्तों को मंगल, श्री और सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं। भगवान शिव के मस्तक पर अर्द्धचंद्र शोभायमान है। इसके संबंध में कहा जाता है कि समुद्र मंथन के समय समुद्र से विष और अमृत के कलश उत्पन्न हुए थे।

इस विष का प्रभाव इतना तीव्र था कि इससे समस्त सृष्टि का विनाश हो सकता था, ऐसे में भगवान शिव ने इस विष का पान कर सृष्टि को नया जीवनदान दिया जबकि अमृत का पान चन्द्रमा ने कर लिया।

विषपान करने के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया, जिससे वे ‘नीलकंठ’ के नाम से जाने गए। विष के भीषण ताप के निवारण के लिए भगवान शिव ने चन्द्रमा की एक कला को अपने मस्तक पर धारण कर लिया। यही भगवान शिव का तीसरा नेत्र है।