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जनमंच पड़ताल: अाखिर कितनी खपत है वाराणसी में गांजे की? कभी टनों में तो कभी कुंतलों में पकड़ा जाता है गांजा…

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इतनी भारी मात्रा में गांजा सीज़ करने के बावजूद बनारस में गांजे की कोई कमी नही है, जनमंच पड़ताल टीम नें पीएम के संसदीय क्षेत्र और देश की सांस्कृतिक राजधानी काशी में गांजे की डिमांड-सप्लाई और कंज्यूमर के बीच की कड़ियों को समझनें की व्यापक कोशिश की…

–जनमंच पड़ताल टीम: ताबिश अहमद, मो० आसिफ़, सुरेश मौर्या, राजकुमार और उनके सौ से अधिक संपर्क सूत्र तथा इंफार्मर…

Shabab Khan

शबाब ख़ान (वरिष्ठ पत्रकार)

 

 

 

 

 

 

जनमंच पड़ताल: पिछले दिनों रामनगर पुलिस नें एक कंटेनर से कई टन गांजा बरामद किया था, अब कोतवाली पुलिस नें आधा कुंतल थामा है, यह वो गांजा है जो पकड़ा गया। सवाल यह है न जानें कितना ऐसा गांजा होगा जो पकड़ा ही नही गया और शहर की गलियों में बिक गया, एेसे में हैरत होती है कि नगरवासी गांजे के कितनें बड़े शौकीन हैं और कितने गांजे की डिमांड रहती है शहर में, वास्तव में यह जांच का विषय है।

विदित हो कि पिछले दिनों सुबह-ए-बनारस का नजारा लेने अचानक अस्सी घाट पर डीएम योगेश्वर राम मिश्रा पहुँच गये। घाट का नजारा देखने के बाद उनके मन में शांति और अध्यात्मिक भावना के बजाए गुस्सा घर कर गया, और क्यो न हो, अस्सी घाट पर यहाँ-वहाँ बैठे मैले-कुचैले अधेड़, नवयुवक, बुढ़े तीन-चार के झुंड में गांजे का सुट्टा मार रहे थे। हवा में गांजे की महक इस कदर थी कि डीएम का गुस्सा फूँट पड़ा और ठीक छह बजे उन्होने उस समय के भेलूपूर इंस्पेक्टर आषेश नाथ सिंह को फोन कर घाट पर तलब कर लिया। जिन्हे अस्सी पहुँचनें में डेढ़ घण्टे लग गये। डीएम नें उनकी लेट लतीफी और घाट पर गांजा का व्यापक इस्तमाल देखकर नाराज़गी जाहिर की और एसएसपी आरके भारद्वाज को अपनें सुबह-ए-बनारस ट्रिप के एक्सपीरियंस से अवगत कराया। दो हफ्ते के अंदर अषेश नाथ सिंह से भेलूपूर थाना लेकर अनुपम श्रीवास्तव को दे दिया गया।

बहरहाल गांजे की बिमारी बनारस में किस हद तक फैली है यह देखने के लिए हमारी वाराणसी टीम नें पक्का महाल की तंग गलियों में घुसकर पड़ताल की, गंगा घाटों में खुद गांजे की डिमांड की, रामनगर के आऊटर एरिया की धूल खायी, लंका में प्राईवेट हॉस्टल के आसपास पुछताछ की, रात में टीम नें मण्डलीय अस्पताल, बीएचयू, दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल के अंदर व बाहर गंजेड़ियों की खोज की, कैण्ट स्टेशन, काशी, मड़ुवाडीह, वाराणसी सिटी स्टोशनों के एक छोर से आख़िरी छोर तक जाकर देखा। रिक्शावालों, ऑटोवालों, चाय-पानवालो, ग्राहक का इंतज़ार करते हिंजड़ों व सेक्स वर्कर्स से गुपचुप जानकारी मांगी, मित्र पुलिसकर्मीयों से मदद ली और जो निष्कर्श निकल कर सामने आया वो आश्चर्यजनक रुप से डरवना था।

गांजा

A Modern girl enjoying Marijuana in posh area of Varanasi…

हमें पता चला कि बनारस के लोग गांजे को किसी भी तरह से गलत मानते ही नही, ‘गांजा तो भोले का प्रसाद है’ व ‘भगवान भी गांजे का सेवन करते हैं’ यह तर्क लगभग हर गंजेड़ी नें हमें दिया। कबीर चौरा अस्पताल, दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल, बीएचयू के ट्रामा सेण्टर व वार्डों के बाहर नॉनस्टॉप गांजे की सप्लाई है, बनारस के सभी रेलवे स्टेशनों के आसपास कोई न कोई गांजा बेचने वाले का हमे पता चला। गंगा घाट, टाऊनहॉल, मैदागिन स्थित कंपनी गार्डेन, बेनिया बाग में हमनें गांजे का धुंआ उड़ाते लोगों को देखा। हॉ, भोले बाबा का पसंदीदा पदार्थ वाली बात तब खारिज हो गयी जब हमनें मुस्लिम समुदाय के लोगों को भी गांजे के धुंए में उड़ते पाया। अगर हमनें साधुओं को गांजा पीते पाया तो पीर-बाबा की मज़ारों के बाहर जुमेरात को पीले कुर्ते-पायजामें में मंलग-मुरीदों को भी चिलम भरते पाया।

गांजा

Sadhu in ancient city, having puffs of weed or Ganja…

हमारी यह पड़ताल इतनी वृहद और व्यापक थी कि हमनें उन दुकानों में भी जाकर जांच की जो मिट्टी से बने मटके, गमले, सुराही वगैराह बेचते हैं। ऐसी हर दुकान में हमने पाया कि वो मिट्टी से बनी चिलम भी बेचते हैं, हर दुकान में कम से कम सौ से दो सौ मिट्टी की चिलम का ढेर हमने बिक्री के लिए सज़ाकर रखा देखा वो भी बिना किसी भय के खुलेआम। चिलम बेचना अपराध नही है लेकिन बिकती चिलम को देखकर गंजेड़ियों की संख्या का आंकलन तो किया ही जा सकता है, सो हमने किया। सूत्रों नें यह भी बताया कि गांजा पीने के लिए जरूरी नही कि चिलम ही प्रयोग की जाये। नौजवानों में चिलम की जगह सिगरेट प्रचलित है, वो सिगरेट के अंदर की तंबाकु निकालकर आधे से अधिक फेंक देते हैं। थोड़ी सी सिगरेट वाली तंबाकु में गांजा मिक्स करके उसे वापस सिगरेट में भर देते हैं, बस स्पेशल सिगरेट तैयार है, गांजे का फुल मज़ा सिगरेट के फ्लेवर में जन्नत दिखाता है।

हमारे विश्वस्नीय सूत्रों नें बताया कि बनारस में हर सरकारी भांग की दुकान का ठेकेदार दुकान के आसपास किसी लड़के को झोले में गांजे की बनी बनाई पुड़िया भरकर दे देता है और भांग की दुकान के पास एक निश्चित जगह बैठा देता है। एक पुड़िया गांजा 40-50₹ में बेचा जाता है। हमनें एक भांग दुकान के मालिक से इस बाबत जानकारी मांगी, नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर उसनें बताया कि ‘भांग बेचने की दुकान का लांइसेंस महँगा है, ऊपर से भी आबकारी विभाग के अधिकारियों को पैसे देना पड़ता है, ऐसे में अगर हम नारकोटिक्स न बेचें तो दुकान का खर्च निकालना भी मुश्किल होता है। गांजा बेचने के एवज में हर महीनें इलाकाई पुलिस को बंधी-बधाई रकम पहुँचा दी जाती है। उसनें बताया कि हर रोज तकरीबन एक किलो गांजा वो बेच लेता है जिससे अच्छी-खासी कमाई हो जाती है।’ हमनें गांजा बेचते युवक को भी देखा, वो बिना किसी भय के खुलेआम बीच बाजार एक चबूतरे पर बैठकर पुड़िया बेच रहा था।

हमारी इस पूरी पड़ताल का निष्कर्श यह निकलकर सामने आया कि बनारस में गांजे की खपत हमारी-आपकी सोंच से परे है। एक आंकलन के मुताबित काशीवासी लगभग दो कुंतल गांजा प्रतिदिन फूंक डालते है, यानि 600 कुंतल हर महीनें गांजा बनारस में खप जाता है। जाहिर है, जब इतनी खपत होगी तो सप्लाई भी होगी ही, जो निर्बाध होती है। हॉ, बीचबीच में गांजा पकड़कर पुलिस यह जरूर सुनिश्चित करती है कि मीडिया, आम जन, उच्चाधिकारी को यह मैसेज जाये कि वो नारकोटिक्स को लेकर कितने सीरियस हैं।

गांजा

A Sadhu Smoking Marijuana in Varanasi….

यह डिमांड और सप्लाई का खेल है जो चलता आया है और चलता रहेगा। उच्चाधिकारी चाहे जितनी कोशिश कर लें बनारस में गांजा बिकता रहेगा। जब तक डिमांड है तब तक सप्लाई जारी रहेगी। पुलिस कुछ को जरूर पकडेगी लेकिन बहुतो को सेफ पैसेज भी मिलता रहेगा। यदि पुलिस प्रशासन और नारकोटिक्स ब्युरो सीरियसली गांजे के इस रैकेट पर चोट करना चाहते हैं तो सबसे पहले उन्हे गांजे के ग्राहक यानि गांजा पीने वालों पर हाथ डालना होगा। आजतक ऐसा कभी नही हुआ कि पुलिस नें किसी गंजेड़ी को जेल भेजा हो। जब गंजेड़ी जेल जाएगें तो डिमांड अपनेआप कम हो जाएगी, फिर सप्लाई भी धीरे-धीरे बंद हो ही जायेगी।

देश की सांस्कृतिक राजधानी काशी गांजे के कसैले धुंये में गर्दन तक डूबा है, टीबी से लेकर गले, फेफड़े का कैंसर, मुंह का कैंसर के रोगियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। नशे के सेवन से नौजवानों में कांफिडेंस, उर्जा, उत्साह खत्म होता जा रहा है, हमारी जेन-नेक्स्ट खोखली होती जा रही है। इसे तुरंत कंट्रोल करना अतिआवश्यक है। प्रशासन को व्यापक रूप से केवल गांजे के धंधे पार वार करना होगा वरना भारत को सुपर पॉवर बनानें का सपना देखना छोड़ दीजिए, गंजेड़ी पीढ़ी जब खुद को संभालने लायक नही होगी तो देश-दुनिया को क्या खाक संभालेगी।

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