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स्कूल की शिक्षा का दर्द, बच्चों का भविष्य अंधकार में

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सईद मोख्तार मोनिस,

”सब का साथ, सब का विकास” की गुंज के साथ जब हम हिन्दुस्तान के उन गाँव में धुमते हैं। जहां की अधिकतर आबादी आपने आजीविका के लिए पलायन को मजबूर है। उस समय गाँव की एक अलग तस्वीर दिखती है। जो सवा करोड़ की आबादी से कहते हैं, मेरी भी आवाज़ सुनों….. आज बिहार के गांव की आवाज़।

भथरी गांव में मुख्यत: मांझी समुदाय के लोग रहते हैं। जो परिवार के साथ आजीविका के लिए गांव, प्रखंड, जिला, शहर और राज्यों में पलायन करते हैं। इन को आजीविका ईंट भटटो पर, खेतीहर मजदुर और डेली मजदुरी से मिलती है। जो पंजाब और दिल्ली की यात्रा पर जा कर पुरी होती है।

इन राज्य में मज़दुरी और आजीविका इन्हें मिल जाती है। पर गांव से महीनों दुर रहना इनकी दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है। भथरी गांव बिहार के नवादा जिला के रोह प्रखंड के छनौन पंचायत का एक गांव है। प्रखंड मुख्यालय से जिसकी दुरी 10 किलो मिटर से जयादा नहीं है।

इस गांव में एक नव-सिर्जीत प्राथमिक विद्यलय है। जिस में दो शिक्षक पदास्थापित है। य़ह स्कूल भवनहीन है। जो गांव के आगंनबाड़ी केन्द्र में चलता है। गांव का आगंनबाड़ी केन्द्र शिक्षा, पोशन और स्वास्थ्य सेवा देने का एक मात्र केन्द्र है।


भवनहीन स्कूल की शिक्षा का दर्द देखना है। तो इस आगंनबाड़ी केन्द्र में देखा जा सकता है। जहां सेविका स्कूल पूर्व शिक्षा की सेवा दे रही होती है। उसी भवन में उसी समय में शिक्षक प्राथमिक शिक्षा का पाठ पड़ा रहे होते है।