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मुस्लिम ‘वोट बैंक’ और सभी राजनीति पार्टी की घटिया नीति

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हाल-फिलहाल उत्तर प्रदेश के चुनाव होने हैं और यहां मुसलमान वोटर्स की अच्छी-खासी संख्या है, लगभग 19 फीसद और इस समुदाय का वोट हासिल करने के लिए तमाम राजनीतिक पार्टियां छिछली राजनीति पर उतर आई हैं.

Betab Ahmad- janmanchnews.com

Betab Ahmad

बेताब अहमद के विचार,

देश आजाद हुए 70 साल पूरा हो चुके है, किंतु अक्सर जब हम जाति और धर्म के नाम पर राजनेताओं को वोट मांगते देखते हैं, तो मजबूर हो कर सोचना पड़ता है कि ‘असल आजादी’ से अभी कोसों दूर है हमारा देश! कहने को तो विकास की पॉलिटिक्स तमाम राजनीतिक पार्टियां करती हैं, बढ़-चढ़कर वादे करती हैं, दावे करती हैं किंतु जब चुनाव आते हैं तो सब कुछ भूल कर जाति और धर्म की तरफ मुड़ जाती है.

जाति के नाम पर और धर्म के नाम पर उम्मीदवार भी तय किए जाते हैं और इतना ही नहीं, बल्कि एक जाति को दूसरे के प्रति भड़काकर, लड़ा कर अपना उल्लू सीधा किया जाता है. यह एक सच्चाई बन चुकी है, जिससे कोई भी विश्लेषक मुंह मोड़ कर अपना पीछा नहीं छुड़ा सकता है. हाल-फिलहाल उत्तर प्रदेश के चुनाव होने हैं और यहां मुसलमान वोटर्स की अच्छी-खासी संख्या है, लगभग 19 फीसद और इस समुदाय का वोट हासिल करने के लिए तमाम राजनीतिक पार्टियां छिछली राजनीति पर उतर आई हैं.

इस बात से किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए और शायद होता भी नहीं अगर कोई पार्टी मुसलमानों की समस्याएं दूर करना चाहती, उनका विकास करना चाहती, मुस्लिम समुदाय में तीन-तलाक जैसी प्रथा का महिलाओं के हित में सजग हल निकालना चाहती, किंतु नहीं यह सब तो हो नहीं रहा है! हो रही है तो बस डर की राजनीति’! जितना मुस्लिम समुदाय को डरा लो ताकि उनका वोट एकमुश्त मिल जाए.

इस मामले में उत्तर प्रदेश के दो प्रमुख राजनीतिक दल समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी सदा से प्रतिस्पर्धा करती रही हैं, तो कांग्रेस भी इस बार मुस्लिम वोट पर अपना दावा कर रही है. पिछले दिनों बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपनी रैली में कहा था कि मुस्लिम बहुल इलाकों में मुसलमानों और दलितों के वोट मिलने से ही बसपा के उम्मीदवार चुनाव जीत जाएंगे. इसलिए मुसलमान उन सीटों पर अपना वोट सपा और कांग्रेस को देकर मुस्लिम समाज के वोट नहीं बांटे, अन्यथा भाजपा को फायदा हो जाएगा! जरा गौर कीजिए कि मायावती जैसी परिपक्व नेत्री भी 21वीं सदी में विकास की राजनीति करने की बजाए 90 के दशक की ‘जाति और सम्प्रदाय’ की राजनीति करने पर उतारू हैं.

वह भी मुस्लिम को भाजपा का डर दिखाकर ही वोट हासिल करना चाहती हैं. समझा जा सकता है कि मुस्लिम वोटर्स पर बसपा सुप्रीमो सहित तमाम नेता इसीलिए मेहरबान हैं, क्योंकि यह वर्ग एकमुश्त वोट देने में यकीन करता है और इस बार चूंकि समाजवादी पार्टी में काफी कलह देखने को मिल रही है, इसलिए मायावती काफी हद तक आशान्वित हैं.

गौरतलब है कि पहले मुस्लिम वोटर्स का एक बड़ा भाग समाजवादी पार्टी की ओर झुका हुआ था और इसीलिए अब बदली परिस्थिति में अपनी ओर मुस्लिम वोटर्स को खींचने हेतु सपा बसपा और कांग्रेस पूरे दमखम से जुटी हुई हैं. कहने को तो यह भी कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के चुनाव प्रबंधक प्रशांत किशोर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव से मुलाकात कर चुके हैं और इसके पीछे भी रणनीति यही है कि मुस्लिम वोटर्स बिखरे नहीं! हालाँकि, प्रशांत किशोर या कांग्रेस पार्टी ने ऑफिशियल तौर पर अभी कुछ स्पष्ट नहीं किया है किंतु इस की संभावना से इनकार भी नहीं किया है.

बात जहां तक मुस्लिम वोटर्स की है, तो इसकी अपनी ख़ास अहमियत है! उत्तर प्रदेश में तकरीबन 150 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोट 20 से 30 फीसद के आसपास है. जाहिर तौर पर अगर इतना बड़ा वोट-वर्ग किसी एक उम्मीदवार की ओर झुक जाए तो बहुत संभावना होती है कि वह जीत जाए! शायद इसी वजह से बसपा सुप्रीमो मायावती ने तकरीबन सौ मुसलमान उम्मीदवार आने वाले विधानसभा चुनावों में उतारा है.

बसपा की इस कोशिश पर समाजवादी पार्टी के मुस्लिम चेहरे आज़म खान कहते हैं कि ‘मायावती की सोच बिल्कुल सही नहीं है और वह इसलिए क्योंकि मुसलमान जानता है कि बसपा भारतीय जनता पार्टी के साथ पहले भी मिल चुकी है’. मतलब यहाँ भी भाजपा का डर! इस सम्बन्ध में कांग्रेस पार्टी भी मुस्लिमों को याद दिला रही है कि केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद गौरक्षा, लव-जिहाद ,दादरी जैसे मुद्दे उठे हैं और इसका मुकाबला सिर्फ कांग्रेस ही कर सकती है. राजनीतिक विश्लेषक यह भी कह रहे हैं कि मुस्लिम वोटर्स को लुभाने के लिए ही कांग्रेस ने गुलाम नबी आजाद को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया है.

देखा जाए तो मुस्लिम वोटर्स को लुभाने के लिए इस बार असदुद्दीन ओवेसी की पार्टी मजलिस ए इत्तेहादुल मुसलमीन भी लगी हुई है. अपने विवादित बयानों से इसके मुखिया असदुद्दीन ओवैसी काफी चर्चित रहते हैं. हालाँकि, बिहार चुनाव में उनका कुछ खास प्रभाव नहीं दिखा, लेकिन उत्तर प्रदेश की उनकी सभाओं में काफी भीड़ जुट रही है. जाहिर तौर पर कुछ सीटों पर वह सपा, बसपा का खेल बिगाड़ सकते हैं.

इस पूरे मामले में जहां तक भाजपा का सवाल है, तो वह तमाम विपक्षी पार्टियों पर गलत ढंग से मुस्लिम राजनीति करने का आरोप लगा रही है. भाजपा के प्रवक्ता श्रीकांत शर्मा ने अपने एक बयान में साफ़ कहा कि सपा, बसपा और कांग्रेस मुसलमानों को सिर्फ वोट बैंक समझते हैं और यह मुसलमानों का सीधा अपमान है. देखा जाए तो यह बात डायरेक्टली गलत भी नहीं है, क्योंकि मुस्लिम समस्याओं को समझने और उसे दूर करने में शायद ही किसी ने रुचि दिखलाई हो! हाँ, मुसलमान का वोट जरूर हर एक को चाहिए.

तमाम राजनीतिक दलों को समझना चाहिए कि बेशक पहले के समय में मुस्लिम राजनीति होती रही हो, पर क्या वाकई 21वीं सदी में भी यह राजनीति ठीक है? आज 1000 तरह के दूसरे मुद्दे हैं, जिन पर गौर किया जाना चाहिए, जिनका हल निकाला जाना चाहिए और अगर हमारे नेता असल समस्याओं का हल निकालने की जगह मुस्लिम राजनीति पर बेवजह चिल्ल-पों मचाते हैं, तुष्टिकरण करने का प्रयत्न करते हैं तो यह शर्मनाक ही होगा और आने वाले समय के लिए उससे भी ज्यादा अफसोसनाक भी होगा।