BREAKING NEWS
Search

“छलके छाले छल के” समाज के छालों की तासीर और तस्वीर…

187
Share this news...

नई दिल्ली। कोरोना काल में जन-जीवन में मची प्रलय को लेकर महानगर के बाशिंदों के बारे में तो मेनस्ट्रीम मीडिया से लेकर सोशल मीडिया सबने आसमान सर पर उठा लिया, लेकिन वहीं पर इस “जागरूक समाज” ने कामगारों के उस बहुत बड़े वर्ग की लहूलुहान मन –आत्मा से अस्तित्व की अंतिम लड़ाई का जिक्र करने में भी बहुत संकोच बरता.

उसके लिए न कहीं जरुरी विमर्श सामने आया न परामर्श और न ही सहानुभूति का स्पर्श. वो भी यूँ तो था आम आदमी ही पर मीडिया में छाए आम आदमी और उसके बीच में असली दूरी लाखों किलोमीटर थी क्योंकि मीडिया का आम आदमी अपने घरों में ही सीमित साधनों के बावजूद किसी–न –किसी रूप में सुरक्षित था, सामाजिक सुरक्षा के घेरे में था और जमा–पूँजी के छोटे ढ़ेरों से ही आपदा के समय पर मुकाबला करने को लेकर आश्वस्त था.

मूल्यों को लेकर भारतीय समाज में दर्शन का अभाव नहीं है. अभाव है तो विपदा के समय उस दर्शन को चरितार्थ करने का. कोरोना की पहली लहर के बाद जिस तरह से कमेरे वर्ग को जोकि देश के बड़े-बड़े महानगरों में रोजी-रोटी के लिए आ बसा था, अपनी जड़ें छोड़कर रातोंरात भागना पड़ा. उनका यह पलायन उन नीतियों के खोखलेपन को उजागर करता है जहाँ एक के विकास के लिए दूसरे के विनाश का तंत्र काम करता है.

मजदूरों के अपने घरों की तरफ लौटने की विवशता, रास्तों में उनके द्वारा झेली गई अमानवीय यंत्रणा, अपनों के साथ हुए अत्याचारों का गम, अनिश्चित भविष्य को लेकर गहरी निराशा और अवसाद का दंश-इन सबकी मार्मिक प्रस्तुति है.

युवा लेखिका प्रीति कुमारी की ताज़ा कृति “छलके छाले छल के” इस उपन्यास में कोरोना काल के दौरान हुए लॉकडाउन से उपजे हालात में मजदूरों की घर वापसी के उनके संघर्ष की बारीकियों को हम परत-दर-परत देख पाते हैं.

समाज से ठुकरा दिए जाने की पीड़ा के साथ और साधनहीन होकर भी सैकड़ों-हजारों किलोमीटर का सफ़र तय करनेवाले इन कमेरों की टीस इस लेखनी में मुखर हुई है.

प्रीति कुमारी के इस उपन्यास का नायक बिजय एक ऐसी अंधी राह का मुसाफिर है जहाँ न उसके पावों के नीचे जमीन है और न सर पर आसमान. उसके सर पर जिम्मेदारी है उन बेहिसाब मजदूरों की जिन्हें कोरोना के नाम पर उनके आकाओं ने दूध में से मक्खी मानकर बाहर निकाल फेंका है. बिजय के पास न पूँजी है, न तकदीर. बस उसके पास एक ही आशा है–घर पहुँचने की. इसके लिए, वो हर संकट को सर पर झेलने के लिए तैयार हो गया. पर इसके साथ ही, जो मुसीबतों का सिलसिला शुरू हुआ. उससे ऐसे-ऐसे नज़ारे सामने आए जिनकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी.

यह यात्रा-वृतांत मजदूरों के साथ हुए छल-प्रपंच का जीवंत दस्तावेज है जोकि उन पहलुओं पर रोशनी डालता है जिनके बारे में शायद कम ही लोगों को जानकारी होगी. इस उपन्यास की लेखिका की भाषा में संवाद की चुस्ती है. मुहावरों का पैनापन है, समाज के लिए चुभते सवाल हैं. पुस्तक का प्रकाशन नयी दिल्ली स्थित जे जे कम्युनिकेशन्स ने किया है.

प्रीति कुमारी इससे पहले दो उपन्यास लिख चुकी हैं. अपने पहले उपन्यास मेरे सपने हुए सच में वे सौरव की संघर्ष यात्रा के माध्यम से लगन, मेहनत और अवसर की त्रिवेणी से हुए चमत्कार को पाठकों के दिलो-दिमाग में चस्पां करने में कामयाब रही हैं.

प्रीति का दूसरा उपन्यास मैली जिंदगी इसी समाज के बेहद उपेक्षित पर लगभग अचर्चित वर्ग-सर पर मैला ढोनेवालों की दारूण सचाई को सामने लाता है. प्रीति फिलहाल दो-तीन ज्वलंत मुद्दों पर सामग्री जुटा रही हैं. जल्द ही वो बांझपन को लेकर अपनी कृति को लेकर सामने आएंगी.

Share this news...