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तीन तलाक विधेयक को मिली कैबिनेट की मंजूरी, संज्ञेय अपराध की श्रेणी में होगा पत्नी पर तीन तलाक का प्रयोग

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किसी भी रूप में इन्स्टंट तीन तालाक- मौखिक, लिखित या इलेक्ट्रॉनिक रूप पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और एक संज्ञेय अपराध बना दिया गया है…

Shabab Khan

शबाब ख़ान (वरिष्ठ पत्रकार)

नई दिल्ली: यह विधेयक जम्मू और कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में त्वरित तीन तलाक (किसी भी समय तीन बार तलाक बोलकर पत्नी से संबंध खत्म कर लेना) के सभी मामलों पर लागू होगा।

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने शुक्रवार को एक विधेयक को मंजूरी दे दी जिसमें त्वरित तीन तलाक या तलाक-ए-बिद्त को एक संज्ञेय अपराध बनाया गया है। विधेयक में त्वारित तीन तलाक का सहारा लेकर पत्नी को छोड़ देने वाले मुस्लिम पति को तीन साल तक की सजा का प्रवाधान है।

शुक्रवार से शुरू संसद के शीतकालीन सत्र में सरकार इस विधेयक को पेश करने का इरादा रखती है। कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने कहा, “मैं बिल के ब्योरे पर फिलहाल चर्चा नहीं कर सकता, लेकिन मैं इतना जरूर कह सकता हूं कि इसका मकसद तीन तलाक की पीड़ितों को एक सुरक्षा कवच देने का है।”

पिछले महीने कानून मंत्रालय ने सभी राज्यों से इस विधेयक से संबंधित उनकी राय मांगी थी, और तुरन्त जवाब देने को लिखा था। “कई राज्यों ने इस विधेयक का समर्थन किया है,” कानून मंत्री ने बताया लेकिन यह सवाल बड़ी चालाकी से टाल गये कि “क्या किसी विपक्ष शासित राज्य नें इस कदम को अस्वीकार करने के संकेत दिए हैं?”

विवाह विधेयक के तहत प्रस्तावित ‘मुस्लिम महिला संरक्षण अधिकार’ जम्मू और कश्मीर को छोड़कर देश भर में त्वारित तीन तिलक के खिलाफ शिकायतों से निपटेंगे। तीन तलाक प्रथा को भारत में गैरकानूनी बनाने का मुद्दा उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा के राजनीतिक अभियान का हिस्सा था। शुक्रवार को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सहयोगियों से कहा कि “यह लैंगिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए एक ऐतिहासिक कदम है।”

उधर कांग्रेस ने इस मुद्दे पर कहा कि वह तीन तलाक जैसी प्रथा को खत्म करनें वाले कानून का समर्थन करता है लेकिन इसके ब्योरे के सार्वजनिक होने के बाद ही प्रस्तावित विधेयक पर टिप्पणी कर सकता है।

निर्वाह भत्ता

मसौदा विधेयक के प्रावधानों के मुताबिक, एक पति जो त्वारित तीन तलाक प्रथा के नियमानुसार पत्नी को छोड़ता है उसे तीन साल तक जेल की सजा दी जा सकती है। इन्स्टंट तीन तालाक चाहे वो मौखिक, लिखित या इलेक्ट्रॉनिक रूप हो, पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और एक संज्ञेय अपराध बनाया गया है। इस विधेयक में एक परेशान मुस्लिम महिला और उसके आश्रित बच्चों के निर्वाह भत्ते और नाबालिग बच्चे की कस्टडी का अधिकार भी उपलब्ध हैं।

एतिहासिक फैसला

पिछले साल अगस्त में, सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय पारित किया था जिसमें त्वरित तीन तलाक को “अवैध और असंवैधानिक” करार दिया गया था। हालांकि, सरकारी सूत्रों का कहना है कि फैसले के बाद भी आंकड़ों के मुताबिक नवंबर तक तत्काल तीन तलाक के 66 मामले सामने आए हैं। और फैसले से पहले 177 मामले दर्ज किए गए थे जिसमें सबसे अधिक उत्तरप्रदेश और बिहार के मामले रिकार्ड किये गये थे।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने इस मुद्दे की जांच के लिए एक अंतर-मंत्रिस्तरीय समूह की स्थापना की थी जिसमें अरुण जेटली (वित्त), राजनाथ सिंह (होम), सुषमा स्वराज (विदेश मामलों), रविशंकर प्रसाद (कानून), उनके सहायक पी. पी चौधरी और प्रधान मंत्री कार्यालय में जूनियर मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह शामिल किये गए थे।

त्वारित तलाक समाप्त करनें का मुद्दा उत्तर प्रदेश चुनावों में भाजपा के राजनीतिक अभियान का हिस्सा था और पार्टी का मानना ​​है कि पीड़ित मुस्लिम महिलाओं को इस कानून के रूप में लाभांश का भुगतान किया गया है।