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नई शिक्षा नीति में शिक्षा के गुणवत्ता एवं प्रबंधन में सुधार हेतु कोई दिशा-निर्देश नहीं: राजद

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पटना। राष्ट्रीय जनता दल के प्रदेश प्रवक्ता सह विधायक डॉ रामानुज प्रसाद एवं राष्ट्रीय जनता दल के प्रदेश महासचिव भाई अरुण कुमार ने एक संयुक्त प्रेस बयान जारी कर कहा की केंद्र सरकार के द्वारा जो नई शिक्षा नीति पेश की गई है। उसे देखने से लगता है की सरकार ने शिक्षा के स्तर को उसके रखरखाव को कैसे दुरुस्त किया जाए इस पर कोई सुझाव नहीं दिया गया। आज तक देश की शिक्षा नीति ट्रायल एवं एरर मैं ही चल रही है जिसका वास्तविक शिक्षा नीति से कोई मतलब नहीं है वास्तविक शिक्षा नीति से गांव के लोगों को दूर कर दिया गया है स्कूल बदहाल हो गया। शिक्षा की गुणवत्ता भारत के अधिकतर राज्यों में प्राया समाप्त हो गए विद्यालय महाविद्यालय सिर्फ परीक्षा लेकर डिग्रीया देने का काम कर रहे हैं। इसी एरर को दूर करने के लिए नई शिक्षा नीति बनाने की बात आई थी जो आयोग बने थे। आयोग ने रिपोर्ट सम्मिट भी किया अब सरकार इस एरर को कैसे दूर करती है और किस प्रकार का अमलीजामा पहनाती है। यह देखने वाली बात होगी।

इस नीति में कोई सुझाव नहीं दिया गया है जिससे पता चल सके की शिक्षा की गुणवत्ता कैसे सुधारी जाए और शिक्षा के प्रबंधन एवं आधारभूत संरचनाओं में कहां से काम होगा। ऐसा लगता है की यह नीति जनता की आंखों में धूल झोंकने वाला है जो बात कोठारी कमीशन ने 1968 मैं कही थी वही बात आधारभूत संरचना एवं बजट के संदर्भ में दोहराई गई है आज की सरकार बढ़ी हुई जनसंख्या एवं बड़ी हुई। महंगाई के बावजूद नीति निर्देशक बजट का 6% लक्ष्य को प्राप्त करने की बात कही है परंतु उसका समय सीमा कई तय नहीं की है कोठारी कमीशन ने जिस समय बजट का 6% शिक्षा पर खर्च करने की बात कही थी। उस समय भारत की जनसंख्या 43 करोड़ थी और आज भारत की जनसंख्या एक अरब 43 करोड़ की है परंतु दुर्भाग्य है कि उस समय भी लक्ष्य को प्राप्त नहीं किए और आज भी लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाए भारतीय जनता पार्टी आर एस एस एवं मोदी समर्थक लोग इस शिक्षा नीति की ढोल पीटने लगे हैं परंतु सच्चाई यह है की पूर्ववर्ती सरकार यानी मनमोहन सिंह की सरकार तक बजट का 3.9 प्रतिशत ही खर्च हो रहा था परंतु जब भाजपा की सरकार आई तो यह घटकर 2.71 प्रतिशत तो कभी 1.5 प्रतिशत ही खर्च कर पाई नई शिक्षा नीति में संविधान की पढ़ाई पर कोई बात नहीं कही गई।

अंबेडकर जी, गांधी जी, लोहिया जी जैसे लोगों के विचारधाराओं को हटाकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय की विचारधारा को पढ़ाए जाने से ऐसा लगता है की नई शिक्षा नीति में शिक्षा का भगवाकरण करने का काम किया जा रहा है। नई शिक्षा नीति में जब तक शिक्षा के स्तर एवं विद्यालयों के स्थिति में सुधार नहीं आती है तब तक नई शिक्षा नीति से कोई फायदा होने वाला नहीं।

आज स्थिति यह है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार जो बैठी हुई है। उसकी पार्टी फंडिंग में वित्तीय वर्ष मैं खर्च के लिए 25 से 30,000 करोड़ का बजट है परंतु शिक्षा विभाग का बजट ₹24000 करोड़ है जो अभी के परिपेक्ष में देखा जाए को प्रत्येक बच्चे पर मात्र 80 पैसे ही खर्च आते हैं ऐसी स्थिति में शिक्षा का स्तर कैसे सुधारा जाए यह विचारणीय प्रश्न है।