lok pariwahan

लोक परिवहन बना अब परलोक परिवहन

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Surendra Joshi

सुरेन्द्र कुमार जोशी

चूरू। राजस्थान लोक परिवहन नाम आज बच्चे बच्चे की जुबान पर हैं। हर दिन इनकी लापरवाही व दादागिरी के किस्से सुनने को मिल रहे हैं। आमजनता आज इसे लोक परिवहन की जगह परलोक परिवहन के नाम से पुकारने लगे हैं।

इनकी मनमर्जी का आलम यह हैं कि सवारी कम होने पर यह आधे रास्ते मे भी सवारियां उतारने में नही हिचकिचाते और अगर मौका त्योहार का हो ओर इनके सामने वाली सवारियों की मजबूरी समझ में आ जाये तो किराया दुगना भी दादागिरी से लेते हैं।

ऐसी बात नही हैं कि इनकी इन हरकतों की जानकारी प्रशासन व जनप्रतिनिधियों को नही हैं पर सब कान में अंगुली डाल कर बैठे हैं। रविवार को रक्षाबंधन की पूर्व संध्या पर जयपुर से शाम 6 बजकर 30 मिनट पर जयपुर के सिंधी कैम्प बस स्टैंड से कोहिनूर ट्रेवल्स की बस नम्बर आरजे 23पीए 8687 रवाना हुई।

जिसमें बस परिचालक ने भेड़ बकरियों की तरह सवारियां ठुंसी व जबरदस्ती तय किराया 170 रुपये जो उनकी यूनियन ने तय किया हैं। उससे अधिक 200 रुपये पर सवारी से जबरदस्ती वसूले ओर ऑब्जेक्शन करने पर नीचे उतरने की धमकी दी ये कोई एक दिन की बात नहीं हैं। जब भी इनको मौका मिलता हैं चाहे वो कोई त्योहार हो या राजस्थान रोडवेज की हड़ताल ये अपनी मनमर्जी पर उतर आते हैं।

हर रोज प्रशासन की नाक के नीचे नियमों की धज्जियां उड़ाते धड़ल्ले से निकलते है पर प्रशासन अनजान बन कर बैठा हैं। लोकपरिवहन के हादसों की खबर अक्सर अखबारों न्यूज चैनलों में आती रहती हैं।

पर इनपर कभी अंकुश नही लगा एक बस में चार से पांच कर्मचारी चलते है जो किसी यात्री के बोलने से पहले चुप करवा देते हैं। नाही कभी इनकी यूनियन जो इनके पक्ष में तो बहुत जल्दी आ जाती है पर इनके यात्रियों जो इनकी रोजी रोटी है के पक्ष में कभी नही बोलते।