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Shankaracharya

शंकराचार्य जी का पंचवा मठ बनाने का सपना रह गया अधूरा

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Sarvesh Tyagi

सर्वेश त्यागी

रीवा। कांची कामकोटि के शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती का एक बड़ा सपना अधूरा रह गया। इसकी जानकारी कम ही लोगों की है कि वह पांचवें मठ की स्थापना चाह रहे थे। अपने नजदीकी संतों के साथ कई बार इस पर मशविरा भी कर चुके हैं।

मध्यप्रदेश के रीवा से उनका गहरा नाता रहा है। यहां पर वे पांचवे मठ की स्थापना चाह रहे थे, इसके लिए प्रयास भी किया था लेकिन उनका यह सपना अधूरा रह गया। 1986 में कांचीकामकोटि के शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती अपने उत्तराधिकारी विजयेन्द्र के साथ रीवा आए थे। उन्होंने भी कहा था कि आदि शंकराचार्य के भ्रमण में रीवा का प्रवास और पांचवे मठ की स्थापना का प्रमाण मिलता है। इस कारण यहां पर पांचवें मठ की स्थापना से सनातन धर्म संस्कृति को मध्यभारत में और भी मजबूती मिलेगी।

रीवा के बीहर नदी के किनारे पंचमठा के नाम से धार्मिक स्थल है, जिसका विस्तार पहले आदि शंकराचार्य ने करने की बात कही थी तो उसके बाद शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती ने भी कहा कि यह धार्मिक महत्व का स्थल है। पुरी के शंकराचार्य निरंजन तीर्थ भी अपने प्रवास के दौरान रीवा के मचमठा का उल्लेख किया था। समय-समय पर यहां कई शंकराचार्यों का आगमन होता रहा है।

1195 वर्ष पहले आए थे आदि शंकराचार्य आदि शंकराचार्य 1195 वर्ष पहले रीवा आए थे। उस दौरान रीवा शहर अस्तित्व में नहीं था। यह जंगली क्षेत्र था, अमरकंटक और प्रयाग के मध्य होने की वजह से यहां पर साधु-संतों का विश्राम होता था। इतिहासकारों का कहना है कि यह क्षेत्र रेवा पट्टनम के नाम से जाना जाता था। देश के चार क्षेत्रों में मठों की स्थापना कर एकात्म दर्शन का सूत्र स्थापित करते हुए नई सामाजिक अलख जगाई।

बताया जाता है कि चार पीठों की स्थापना के बाद देशाटन में निकले ओंकारेश्वर, काशी, प्रयाग के बाद रीवा आए। करीब सप्ताह भर यहां रहकर आध्यात्मिक जानकारियां लेने के बाद पांचवे मठ के रूप में रीवा को घोषित किया। तभी से संत समाज इसे पंचमठा कहने लगा। जयेन्द्र सरस्वती ने 1986 में रीवा प्रवास के दौरान इस घटनाक्रम का उल्लेख भी किया था।

बौद्धों का प्रभाव कम करने चुना था क्षेत्र पंचमठा से जुड़े डॉ. कुशल प्रसाद शास्त्री बताते हैं कि आठवीं सदी में इस क्षेत्र में बौद्धों का प्रभाव अधिक था। उसे समाप्त कर एकात्म दर्शन से जोडऩे के लिए आदि शंकराचार्य देशाटन में निकले थे। सप्ताह भर बीहर नदी के किनारे बने आश्रम में वह ठहरे और इस पांचवे मठ के रूप में विकसित करने का संकेत दिया।

दूसरे मठों में वह उत्तराधिकारी नियुक्त कर चुके थे लेकिन रीवा में उसकी व्यवस्था करने से पूर्व ही 32 वर्ष की आयु में सन 820 में उन्होंने प्राण त्याग दिए, इस कारण यह क्षेत्र आध्यात्मिक रूप से विकसित नहीं हो सका। शास्त्री का कहना है कि देउर कोठार, त्योंथर, भरहुत जैसे कई उदाहरण हैं कि उस दौरान यहां बौद्धों का ही बोलबाला था। शंकराचार्य की वजह से ही सनातन धर्म व्यवस्था यहां बढ़ी। जयेन्द्र सरस्वती ने कहा था कि इस क्षेत्र को आध्यात्मिक केन्द्र बनाएंगे।

सरकार ने शुरू की थी एकात्म यात्रा जयेन्द्र सरस्वती ने आदि शंकराचार्य के सपने को साकार करने की बात रीवा में कही थी। 31 साल बाद 19 दिसंबर 2017 को मध्यप्रदेश सरकार ने रीवा से एकात्म यात्रा की शुरुआत की थी। जिसके चलते मचमठा का महत्व बढ़ा है। इस दौरान भी जयेन्द्र सरस्वती द्वारा कही गई बातों का रीवा पहुंचे संतों ने जिक्र किया था।

मध्य भारत का प्रमुख आध्यात्मिक केन्द्र बनाने का था सपना रीवा प्रवास के दौरान जयेन्द्र सरस्वती के कार्यक्रम के प्रमुख आयोजकों में शामिल रहे माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के समन्वयक जयराम शुक्ला बताते हैं कि उन्होंने बताया था कि देश के चार हिस्सों में मठों की स्थापना के बाद मध्य भारत में भी आदि शंकराचार्य ऐसे आध्यामिक केन्द्र को विकसित करना चाह रहे थे जहां से एकात्म दर्शन को आगे बढ़ाते हुए सामाजिक एकता की अलख जगाई जा सके।

प्रयाग, काशी, चित्रकूट, अमरकंटक, जबलपुर आदि क्षेत्र उस दौरान संतों के प्रमुख केन्द्र थे। इनके मध्य रेवा पट्टनम(रीवा) को वह विकसित करना चाह रहे थे। आदि शंकराचार्य के संदेश में यह था कि रेवा पट्टनम से देश के बड़े हिस्से में एकात्म दर्शन का संदेश दिया जा सकता है।