योगीराज आते ही ये क्या हो गया, गरीब पर पड़ी चीनी की ‘मार’

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शबाब ख़ान, वाराणसी: चीनी की मिठास गरीबों से और दूर हो गई है। कोटे की दूकान से रियायती दर पर मिलने वाली एक किलो चीनी से किसी तरह महीने भर तक काम चला लिया करते थे लेकिन अब उनका वह सहारा भी छिन गया है। एक वक्त की चाय के लिए भी चीनी उन्हें बाजार से खरीदना पड़ेगा। अप्रैल महीने से कोटे से चीनी मिलनी बंद हो गई है।

कोटे से 13.50 रुपये में एक किलो चीनी प्राप्त करने वाले गरीबों को अब इतने के लिए बाजार 44 रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। अब वे या तो 30.50 रुपये का अतिरिक्त बोझ उठाएं या फिर मनमसोस कर बैठ जाएं। इस लिहाज से एक किलो चीनी के लिए पात्र गृहस्थी और अंत्योदय को मिलाकर जिले के छह लाख अट्ठारह हजार तीन सौ उनहत्तर कार्डधारकों पर अब हर महीने एक करोड़ 88 लाख 60 हजार 254 रुपये का बोझ और बढ़ गया है।

अप्रैल से कोटे की दूकानों को चीनी का आवंटन बंद कर दिया गया है। चीनी वितरण बंद होने की जानकारी न होने से कोटेदारों और कार्डधारकों में किचकिच भी हो रही है। शहर से गांव तक कोटेदारों को कार्डधारकों को समझाना पड़ रहा है कि सरकार ने अब कोटे से चीनी का वितरण बंद कर दिया है। हालंकि वितरण प्रणाली से जुड़े सूत्रों का दावा है कि हर महीने बमुश्किल 50 फीसदी कार्डधारक ही अपने कोटे की चीनी उठाते थे। बाकी पचास फीसदी कार्डधारकों की चीनी कालाबाजारियों की भेंट चढ़ जा रही थी।

कोटेदारों और अफसरों की मिलीभगत से यह खेल मार्च महीने तक खूब चला। जिले को हर महीने 60 से 62 मीट्रिक टन चीनी का आवंटन होता था। यानी 6,18,369 किलो चीनी का आवंटन पात्र और अंत्योदय कार्डधारकों के लिए होता था। जो गरीब कार्डधारक हर महीने अपने कोटे की निर्धारित चीनी लिया करते थे, अब उनके सामने अधिक खर्च करने के सिवा कोई विकल्प नहीं। गरीबों का कहना है कि सरकार ने चीनी बंद किया तो उसे इसके बदले कैश सब्सिडी मुहैया कराए।