यूपीकोका

फिर से विधानसभा में यूपीकोका बिल हुआ पास, विपक्ष नें कहा– यह ‘काला कानून’ है, सरकार करेगी दुरुपयोग

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यूपीकोका बिल 21 दिसम्बर 2017 को भी पारित हो गया था, विपक्ष नें तब भी किया था हंगामा, विधान परिषद में यह पारित नही हुआ तो मंगलवार को सरकार नें फिर से इसे बिना संशोधन के सदन में रखा…

Shabab Khan

शबाब ख़ान (वरिष्ठ पत्रकार)

 

 

 

 

 

 

लखनऊ: महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून (मकोका) की तर्ज पर माफिया और संगठित अपराध से निपटने के लिए उत्तर प्रदेश संगठित अपराध नियंत्रण विधेयक, 2017 (यूपीकोका) विपक्ष के बहिर्गमन के बीच मंगलवार को विधानसभा में दोबारा पारित हो गया। राज्यपाल और केंद्र की अनुमति मिलते ही यह कानून प्रभावी हो जाएगा।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंगलवार को सदन में यूपीकोका की विशेषता बताते हुए यह प्रस्ताव रखा। योगी ने बताया कि यह विधेयक 21 दिसंबर, 2017 को विधानसभा में पारित होने के बाद विधान परिषद में भेजा गया था। प्रवर समिति को सौंपा गया, लेकिन एक भी संशोधन नहीं हुआ और 13 मार्च को विधान परिषद की बैठक में यह अस्वीकार हो गया। जैसा कि पहले इस सदन द्वारा मूलत: पारित किया गया था, वैसे पुन: पारित किया जाये। योगी के इस प्रस्ताव का विपक्ष ने विरोध किया।

नेता प्रतिपक्ष राम गोविंद चौधरी, नेता बसपा लालजी वर्मा और नेता कांग्रेस अजय कुमार लल्लू ने इसे लोकतंत्र और जनप्रतिनिधियों, संविधान, पत्रकारिता और मानवाधिकारों का विरोधी बताते हुए प्रवर समिति को सौंपे जाने की मांग की। विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित का कहना था कि चूंकि यह विधेयक एक बार विधानसभा से पारित है और इसमें कोई संशोधन नहीं किया गया इसलिए इस पर चर्चा की जरूरत नहीं है। मुख्यमंत्री ने सदस्यों से बल देकर इसे पारित किये जाने की अपील की। सपा, बसपा और कांग्रेस के सदस्यों ने विरोध स्वरूप सदन से बहिर्गमन कर दिया। इस दौरान सत्तापक्ष के सदस्यों ने ध्वनिमत से इस विधेयक को पारित कर दिया।

समाज के अंतिम व्यक्ति को सुरक्षा की गारंटी देगा यूपीकोका: योगी
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि यूपीकोका समाज के अंतिम व्यक्ति की सुरक्षा की गारंटी देने वाला है।यूपीकोका का कहीं दुरुपयोग नहीं होगा और इसमें पूरी व्यवस्था दी गई है। मुकदमा पंजीकरण से लेकर आरोप पत्र दाखिल करने के लिए उच्चाधिकारियों के अनुमोदन की व्यवस्था भी बताई। कहा, विपक्ष की खिसियाहट को समझा जा सकता है। इनमें जवाब सुनने का सामथ्र्य नहीं है इसलिए ये लोग सदन से वाकआउट करते हैं। योगी ने कहा कि यह संविधान सम्मत है और जनहित में लाया गया है।

उन्होंने नेता प्रतिपक्ष पर तंज कसते हुए कहा कि लोकतंत्र की सर्वाधिक धज्जी उड़ाने वाले लोकतंत्र की दुहाई दे रहे हैं। योगी ने उत्तर प्रदेश पुलिस की सराहना करते हुए एटीएस, एसटीएफ के गुडवर्क भी गिनाए। दावा किया कि अपराध में गिरावट आयी है। योगी ने कहा कि उप्र देश का सबसे बड़ा राज्य है। प्रदेश की सीमा नेपाल से भी मिलती है और यह खुली है। खुली सीमा और प्रदेश व देश के रिश्ते को देखते हुए ऐसे कानून की जरूरत है। ऐसा कानून जो संगठित अपराध पर कठोरता और आम जनता को सुरक्षा दे सके। उन्होंने एक वर्ष में प्रदेश में शांतिपूर्ण माहौल में त्योहार और पर्व मनाये जाने का भी ब्योरा दिया।

अघोषित इमरजेंसी की तरह यूपीकोका: राम गोविंद
नेता प्रतिपक्ष राम गोविंद चौधरी ने कहा कि यह हम नहीं कह रहे हैं। इसी विधानसभा में बहुत पहले यह विधेयक आया था तब संसदीय कार्यमंत्री सुरेश खन्ना विपक्ष में बैठते थे। उन्होंने यूपीकोका का विरोध करते हुए कहा था कि यह कानून अघोषित इमरजेंसी की तरह आया है। भाजपा दल नेता स्व. हुकुम सिंह ने तब कहा था कि इस विधेयक से यूपी में किसी भी राजनीतिक व्यक्ति की आजादी सुरक्षित नहीं है। इसका प्रयोग प्रतिपक्ष के नेताओं का गला दबाने में होगा।

राम गोविंद ने सत्तापक्ष के इन दो नेताओं के वक्तव्य की नजीर रखते हुए सवाल उठाया कि जब सरकार ने शांतिपूर्ण माहौल बनाकर अपराधियों की नकेल कस दी तब इस कानून की क्या जरूरत है। उन्होंने आपातकाल की याद दिलाते हुए कहा कि गुंडा एक्ट आया तो सबसे पहले लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रनेताओं पर लगा। ऐसे ही एनएसए, गैंगस्टर समेत सभी एक्ट सबसे पहले नेताओं पर लगे। राम गोविंद ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। बढ़े अपराधों के आंकड़े गिनाए। कहा, यह विधेयक सूचना प्रसारण पर रोक और संविधान की आत्मा का हनन है। यह पत्रकारिता के अधिकारों पर कुठाराघात है।

उन्होंने इसके प्रावधान का विश्लेषण करते हुए कहा कि इससे किसानों पर भी खतरा है। कहा, यह गलत मंशा से लाया गया है और इससे संविधान का गला घोंटा जा रहा है। चौधरी ने विधानसभा अध्यक्ष से अनुरोध किया कि जिस आसन पर आप बैठे हैं उसी आसन पर बैठे वासुदेव सिंह ने उर्दू को द्वितीय राजभाषा का दर्जा देने वाला विधेयक सदन में पेश नहीं होने दिया। उन्होंने महाभारत के प्रसंगों की याद दिलाते हुए कहा कि अध्यक्ष जी असमंजस ठीक नहीं है। लोकतंत्र की गरिमा को नंगा होने से बचाएं। इसकी जिम्मेदारी आपकी है।

महाराष्ट्र में मकोका से अगर अपराध कम हो गए तो बताएं: लालजी वर्मा
बसपा दल के नेता लालजी वर्मा ने विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि नेता सदन का वक्तव्य ही विरोधाभासी है। यह कानून बनते ही पुलिस इसके दुरुपयोग में लगेगी। उन्होंने कहा कि हमारी सरकार में यह विधेयक आया था, लेकिन इसकी उपयोगिता न होने से हमारी सरकार ने स्वत: वापस ले लिया था। उन्होंने कहा कि नेता सदन पक्षपात पूर्ण रवैये से अपराध नियंत्रित नहीं होगा। आपको मन बड़ा करना होगा। वर्मा ने सवाल उठाया कि महाराष्ट्र में मकोका लागू होने से क्या अपराध कम हो गए। अगर वहां अपराध कम नहीं हुए तो यूपी में इसकी कोई आवश्यकता नहीं है।

जनप्रतिनिधियों के खिलाफ बनेगा हथियार: लल्लू
कांग्रेस दल नेता अजय कुमार लल्लू ने कहा कि यह जनता के लिए संघर्ष करने वालों के विरोध में है। यह जनप्रतिनिधियों के खिलाफ हथियार बनेगा। उन्होंने पुलिसकर्मियों का वेतनमान बढ़ाने की भी मांग रखी।

योगी आदित्यनाथ ने कहा इससे पहले यूपीकोका एक बार विधानसभा के पास जाकर विधान परिषद से कैंसिल होकर वापस विधानसभा में आया है। इस संबंध में मुझे सिर्फ इतना कहना है कि यह जो संगठित अपराध का विषय है यह आज सिर्फ जिला और प्रदेश स्तर नहीं बल्कि देश स्तर का की जरूरत है।

यूपीकोका बिल पर नेता विरोधी दल नेता रामगोविंद चौधरी ने कहा कि इस बिल के माध्यम से प्रदेश सरकार अब अपनी नाकामी छुपा रही है। एक वर्ष में इस सरकार के कार्यकाल में 20.37 फीसदी अपराध बढ़ा है।

समाजवादी पार्टी के विधायक डॉ संग्राम सिंह ने कहा कि सरकार विपक्ष को यूपीकोका बिल से डरा रही है। यूपी कोका तो पूरी तरह काला कानून है। यूपीकोका मानवाधिकार का हनन करता है। सदन में हमने इस कानून का विरोध किया है।

मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने कहा कि यूपीकोका बिल पर विपक्ष के तर्क आधारहीन हैं। सरकार कड़े कानून से संगठित अपराध को रोकना चाह रही है। प्रदेश में हम अपराधियों को संदेश देना चाह रहे हैं। अपराध पर नियंत्रण के लिए कठोर कानून जरूरी है।

गौरतलब है कि संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (यूपीकोका) बिल बीते वर्ष 21 दिसंबर को विधानसभा से पास हो गया था। जिसके बाद बिल को विधान परिषद भेजा गया। विपक्ष की आपत्तियों के बाद इसे सदन की प्रवर समिति के पास भेज दिया गया था। वहां से लौटने के बाद 13 मार्च को सरकार द्वारा इस पर विचार का प्रस्ताव विपक्ष की एकजुटता के कारण गिर गया था। लिहाजा अब प्रक्रिया के तहत इसे फिर से विधानसभा में पेश किया गया।