Himanshu gangawar

यूपी में मिले खेती के भागीरथ: छः वर्षो से ले रहे है गन्ने की पेड़ी से पैदावार और आय

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Priyesh Shukla

प्रियेश शुक्ला

लखनऊ। फर्रुखाबाद के कायमगंज के किसान हिमांशु गंगवार पिछले 10-15 वर्षों से जीरो बजट प्राकृतिक खेती करते आ रहे हैं। भाई सुधांशु गंगवार, साथी पंकज गंगवार और इसी ज़िले में कुंईयाधीर निवासी सुरेंद्र गुप्ता गन्ने की खेती कर रहे हैं। तकरीबन 20 एकड़ क्षेत्रफल की गन्ने की खेती में होने वाले उत्पादन का उपयोग गुड़ बनाने में कर रहे हैं।

रासायनिक और जैविक खेती करने की बजाय जीरो बजट प्रकृतिक खेती अपना चुके इन किसानों को बहुत लाभ है। 15 से 17 लाख प्रति वर्ष शुद्ध मुनाफा कमाने वाले ये किसान अब शून्य बजट खेती में ही अपना भविष्य देखने लगे हैं। इतना ही नहीं, कृषि वैज्ञानिकों द्वारा अस्वीकार कर दी गयी गन्ना प्रजाति (वेराइटी) कोशा 767 की पिछले 6 वर्षों से लगातार पेड़ी काट रहे हैं। 250 कुंतल प्रति एकड़ उपज ले रहे इन किसानों का कहना है कि इससे घाटा नहीं है। ये सभी अपने द्वारा उटादित गन्ने से गुड़ बनाने का काम भी कर रहे हैं। गुड़ की अधिक रिकवरी लेकर ये दिनों दिन मालामाल हो रहे हैं।

नहीं होता घटा, बढ़ जाते हैं कल्ले…

शून्य बजट प्राकृतिक खेती अपना चुके इन किसानों को लगातार पेड़ी उगाने से कोई घाटा नहीं है। हाँ यह जरूर है कि गन्ने की लंबाई कुछ कम हो जाती है, लेकिन अधिक कल्ले होने से उनका संभावित घाटा न के बराबर होता है। बढ़ी शर्करा से उन्हें गुड़ की अधिक रिकवरी भी मिलती है। सामान्य तौर पर 8 से 10 प्रतिशत मिलने वाली रिकवरी की जगह वे 10 से 13 प्रतिशत की रिकवरी ले रहे हैं।

जीवामृत और खट्टे मट्ठे का करते हैं प्रयोग…

फसलों की बढ़वार और सुरक्षा के लिए रासायनिक खादों और कीटनाशकों का प्रयोग न करने वाले इन किसानों की मानें तो जीवामृत से फसल को संजीवनी मिलती है। घर पर ही तैयार जीवामृत को फसल में डालते हैं। इसमें केवल शुद्ध देसी गाय के त्याज्यों और प्रकृति से मिले फसलों या उससे तैयार खाद्य पदार्थों को शामिल कर बनाया जाता है। फसल को कीटों और रोगों से बचाने के लिए देसी गाय की दही से तैयार खट्टे मट्ठे को छिड़का जाता है।

अपशिष्टों का प्रयोग कर बचाते हैं फसल…

किसान अपनी फसलों को बचाने के लिए कृषि अपशिष्टों का प्रयोग करते हैं। दीमक भी इनके मित्र बन जाते हैं। बोई गई फसल के बाद बची शेष भूमि।में इन्हें बिछाने से दीमक जैसे कीट भी उन्हीं अपशिष्टों को खाने में लग जाते हैं। इससे फसल को कोई नुकसान नहीं होता है और फसल सही सलामत बची रहती है।

बोले विशेषज्ञ…

गन्ना किसान संस्थान गोरखपुर के सहायक निदेशक डॉ. ओमप्रकाश गुप्ता की मानें तो दुनिया के कुछ देशों में पहले से ही तीन से अधिक पेड़ियाँ ली जा रहीं हैं, लेकिन भारतीय किसान सामान्य तौर पर अभी दो पेड़ी ही लेते हैं। शून्य बजट प्राकृतिक खेती से अगर गन्ना किसान 6 पेड़ियाँ ले रहे हैं तो उत्साहजनक प्रदर्शन है। मॉरीशस में चार पेड़ी, ऑस्ट्रेलिया में 6 पड़ी, फिलीपींस में तीन और चीन में भी चार पेडियां ली जा रहीं हैं।