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फोटो: पद्मश्री सुभाष पालेकर

‘पालेकर मॉडल’ ने दी खेती और किसानों को ‘संजीवनी’

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Priyesh Shukla

प्रियेश शुक्ला

लखनऊ। चार एकड़ क्षेत्रफल में खेती करने वाले सीतापुर जिले के रेउसा ब्लाक के सिकौहा गांव के किसान श्वेतांक त्रिपाठी अब काफी खुश हैं। ‘पालेकर मॉडल’ यानी ‘शून्य बजट प्राकृतिक खेती’ ने इनकी दुनिया ही बदल दी है। पालेकर सिद्धांत पर भूमि व फसल स्वास्थ्य से जुड़ी दवाइयां बनाकर क्षेत्रीय किसानों के लिए नज़ीर बन गए हैं। अब हर कोई इनसे खेती-किसानी की टिप्स ले रहा है।

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इतना ही नहीं, इन्हें अपने खेतों की जुताई भी नहीं करनी पड़ती है। केवल फावड़ा चलाने से ही खेती में सारे काम हो जाते हैं। यहां तक जमीन की ऊर्वराशक्ति बढ़ाने में भी फावड़ा विधि काफी सफल है। अपने प्रयोगों के आधार पर वैज्ञानिकों को चुनौती देने वाले श्वेतांक और राजीव की माने तो पपीता-मेंथा-सूरन, मिर्च-पपीता तथा तरबूज-पपीता-केला इनकी प्रमुख सह-फसली खेती है। इसे अपनाकर अब ये 10 लाख सालाना का मुनाफा कमा रहे हैं।

Padmashree Palekar

फोटो: यूपी के मुख्यमंत्री व कृषि मंत्री के साथ पद्मश्री पालेकर

पद्मश्री पालेकर की शून्य बजट प्राकृतिक विधि पर खेती करने वाले श्वेतांक त्रिपाठी अपने भाई राजीव त्रिपाठी के सहयोग से अब प्रकृति के साथ कदमताल करने वाले श्वेतांक ने एक दवा विकसित कर ली है। संजीवनी नाम की यह दवा न सिर्फ भूमि, फसलों और पौधों के लिए स्वास्थवर्धक है बल्कि मानव स्वास्थ्य की बनाये रखने में भी कारगर है। इसी फसल और मानव के कई तरह की बीमारियों का इलाज हो रहा है।

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श्वेतांक बताते हैं कि खुद के द्वारा तैयार इस दवा (संजीवनी) को तैयार करने में भी ‘पालेकर मॉडल’ ही आधार है। इसमें भी गो-मूत्र, गोबर, गुड़, दाल की चूरन, खेत के मेड की मिट्टी और पानी का ही प्रयोग होता है, लेकिन आलू या अन्य फसलों पर झुलसा रोग का प्रभाव होने की दशा में इसमें हल्दी का अर्क मिलाकर उपयोग करने से रोग का प्रभाव नहीं रहता है।

झुठलाता है वैज्ञानिक प्रयोग, एक साथ उगते हैं मिर्च-पपीता…

श्वेतांक त्रिपाठी का कहना है कि जब उन्होंने सह-फसली खेती शरू की तो कई तरह के प्रयोग शुरू किया। समस्याओं से सामना हुआ। इसके बाद उन्होंने खुद भी प्रयोग शुरू किया। मिर्च और पपीता की खेती में दौरान वैज्ञानिकों द्वारा बताई गई समस्याओं से सामना हुआ। फसल वायरस की चपेट में आ गया।

फिर परंपरागत खेती करने वाले बड़े-बुजुर्गों से चर्चा के दौरान हल्दी के गुण के बारे में जानने का मौका मिला। फिर ‘पालेकर विधि’ से तैयार होने वाली दवाओं की तरह ही ‘संजीवनी’ नाम की दवा तैयार की और उससे अच्छा रिस्पॉंन्स मिला। ‘पालेकर’ और खुद द्वारा तैयार दवा में सिर्फ पानी की मात्रा (200 लीटर पानी की जगह सिर्फ 69 लीटर पानी लिया) का अंतर है। यह कई वर्ष के प्रयोगों के बाद सिद्ध हो सका है। उसी दवा में अब हल्दी का अर्क मिलाकर झुलसा रोग से फसलों का बचाव भी करते हैं।

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यह है लाभ…

भूमि शोधन में है कारगर
जल शोधित कर निमिटोड रोग को करता है दूर
फसलों की जड़ों में नहीं बनातीं हैं गांठें
देर से बोई गई फसलें भी समय से होती हैं तैयार
देर से बुबाई के बाद भी मिलता है अच्छा उत्पादन
भूगर्भ जल का होता है शोधन