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यूपीकोका में ऐसा क्या है जो इसे विपक्ष की नजरों में ‘काला कानून’ बनाता है

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केवल संदेह के आधार पर हिरासत में लिये गये व्यक्ति की जमानत भी यूपीकोका के तहत छह महीनें से पहले नहीं हो सकती; पुलिस रिमांड 14 दिन के बजाए 30 दिन की होगी; मीडिया पर भी पाबंदी…

Shabab Khan

शबाब ख़ान (वरिष्ठ पत्रकार)

वाराणसी: संगठित अपराध, भूमि और खनन माफिया से लड़ने के लिए “कठोर” Uttar Pradesh Control of Organised Crime Act 2017 (UPCOCA) के मसौदा बिल को राजनीतिक बाधाओं को दूर करने, प्रतिद्वंद्वियों को दबाने, असंतोष की आवाज और धार्मिक अल्पसंख्यकों को लक्षित करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल होने का डर है।

प्रस्तावित कानून विधानसभा में चर्चा के लिए 20 दिसंबर को लाया गया था, जिसे विपक्ष के विरोध के बावजूद 21 दिसम्बर को पास कर दिया गया। सशक्त Maharashtra Control of Organised Crime Act (MCOCA) की तर्ज पर बिल तैयार किया गया है। योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सरकार राज्य में प्रस्तावित कानून को संगठित अपराधों से निपटने के लिए “कुशल” मानती है।

वहीं विपक्षी दलों ने इसे एक साथ खारिज कर दिया। पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव ने इस विधेयक का विरोध करते हुए कहा था कि यह केवल “अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं को धमकाने” और “लोगों को धोखा देने” के लिए लाया जा रहा है। “पहले मुख्यमंत्री ने कहा कि मुठभेड़ों के बाद कानून और व्यवस्था में सुधार होगा। लेकिन यह केवल बदतर हो गया है अब वे यूपीकोका कह रहे हैं यह लोगों को धोखा देना है… यूपीकोका कानून और व्यवस्था में सुधार नहीं करेगा,” उन्होंने कहा। लखनऊ के बीचोंबीच भाजपा के पूर्व विधायक के बेटे की हालिया हत्या की याद दिलाते हुये उन्होने कहा।

बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) सुप्रीमो और चार बार पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने कहा है कि यूपीकोका का इस्तेमाल दलित, गरीब और धार्मिक अल्पसंख्यकों के दमन के लिए किया जाएगा।

यूपीकोका के तहत परिभाषित अपराधों में से कुछ हैं- भूमि पर अवैध कब्जा (सरकार और गैर-राज्य संपत्ति), अवैध खनन, अवैध निर्माण, गैरकानूनी दवाओं की बिक्री, अवैध शराब, मनी लॉन्ड्रिंग, वन्यजीव तस्करी, जबरन वसूली, अपहरण सिंडिकेट, हफ़्ता वसूली, हत्या, हत्या की साजिश और सफेदपोश अपराध।

विधेयक का कहना है कि जो कोई भी षड्यंत्र करता है या प्रयास करता है, जानबूझकर या किसी भी तरह संगठित अपराध या किसी संगठन के अपराध की तैयारी के लिए सुविधा प्रदान करता है, वह यूपीकोका के तहत दंडनीय होगा, उसे कारावास का दंड मिलेगा जो कि सात साल से कम नहीं होगा, इसे उम्रकैद तक बढ़ाया जा सकता है। कम से कम 15 लाख का जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

यूपी में संगठित अपराध के खिलाफ मौजूदा कानून गैंगस्टर एक्ट के अलावा यूपीकोका मे 28 प्रावधान हैं।

प्रवाधान जो प्रस्तावित कानून को ‘काला कानून’ बनाते है…

यूपीकोका के तहत आरोपी की जमानत छह महीने से पहले नही हो पाएगी।

प्रस्तावित विधेयक में एक अभियुक्त के लिए 30 दिनों के लंबे समय तक पुलिस रिमांड का प्रावधान है, इसके अलावा उसकी बंद-दरवाजा पूछताछ संभव होगी। यही प्रवाधान उन लोगों पर भी लागू होगा जिन्हे केवल संदेह के आधार पर हिरासत में लिया गया हो, इन्हें भी 6 महीनें से पहले जमानत नही मिल सकती।

अपराधियों को कम से कम तीन साल की जेल की सजा दी जाएगी और अधिकतम आयु कारावास या मौत की सजा भी होगी। इसमें 5 लाख रुपये से 25 लाख रूपए तक का जुर्माना भी लगाया जाता है, आरोप पत्र दाखिल करने की अवधि 90 दिनों से 180 दिनों तक बढ़ाती है।

प्रस्तावित विधेयक में साक्ष्य के बोझ को अभियोजन पक्ष से आरोपी पर स्थानांतरित कर दिया है। यानि अब अभियुक्त को अपनी बेगुनाही सिद्ध करनी होगी। यह प्रवाधान कानून के मूल सिद्धांत का उल्लंघन करता है जिसमें कहा गया है कि जब तक दोष सिद्ध नहीं होता तब तक सभी निर्दोष होते हैं। यदि व्यक्ति को अपनी बेगुनाही साबित करना है, तो कौन जांच करेगा?

पुलिस के सामने किए गए बयान को अंतिम माना जाएगा, यानि थर्ड डिग्री का प्रयोग कर पुलिस व्यक्ति से मनमर्जी बयान ले सकती है जोकि कोर्ट मे मान्य होगा। यह प्रवाधान सीआरपीसी के विपरीत है, जिसके तहत केवल एक मजिस्ट्रेट के समक्ष स्वेच्छा से दिया गया बयान ही स्वीकार्य होगा।

आमने-सामने होने वाली शिनाख्त परेड के आयोजन के बजाय, पुलिस अभियुक्त के वीडियो और फ़ोटो के माध्यम से पहचान करायेगी जिसमें आसानी से छेड़छाड़ की जा सकती हैं।

यूपीकोका के प्रावधानों के अनुसार, अधिनियम के तहत गिरफ्तार किए गए लोगों को जेल के उच्च सुरक्षा वाले सेल मे दाखिल कराया जाएगा। जिला मजिस्ट्रेट की अनुमति के बाद ही, उनके रिश्तेदार या सहयोगी उन्हें जेल में मिल पाएंगे। मेडिकल बोर्ड के अनुमोदन के बाद ही आरोपी को 36 घंटे से अधिक समय तक अस्पताल में रहने की अनुमति दी जाएगी।

यूपीकोका कानून आरोपी को गिरफ्तार करने और अपराध सिंडिकेट के सदस्यों को कस्टडी में लेने के लिये पुलिस को विशेष अधिकार देगा। प्रस्तावित विधेयक के तहत, राज्य को ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए गठित एक विशेष अदालत की सहमति लेने के बाद आरोपी की संपत्ति को जब्त करने का अधिकार होगा- यह प्रावधान पहले से ही गैंगस्टर अधिनियम में है।

नया विधेयक राज्य को सजा के बाद भी आरोपी की संपत्तियों को जब्त करने की अनुमति देगा। मकोका की यूपीकोका भी पुलिस को वायर, इलेक्ट्रॉनिक या मौखिक संचारों को टैप करने और अभियुक्त के खिलाफ साक्ष्य के रूप में अदालत के समक्ष पेश करने का अधिकार देता है।

प्रस्तावित विधेयक में से एक प्रावधान में पत्रकारों को संगठित अपराध पर कुछ भी प्रकाशित करने से पहले सक्षम अधिकारियों से अनुमति लेने की आवश्यकता है। “… संगठित अपराध सिंडिकेट की सहायता करने वाली किसी भी जानकारी का आदान-प्रदान या प्रकाशित करना, संगठित अपराध सिंडिकेट से प्राप्त किसी भी दस्तावेज़ या मामले का वितरण सक्षम एजेंसी से अनुमति के बाद होगा,” बिल का कहना है। यानि सिंडिकेट का स्टिंग करके हम पत्रकार प्राप्त जानकारी को प्रकाशित या टेलीकास्ट करने के बजाए उसे अधिकारी को उपलब्ध कराना होगा।

सरकार का तर्क है कि विधेयक में दुरुपयोग की जांच के प्रावधान हैं। यहां बताया गया है कि:

(ए) प्रस्तावित यूपीकोका के तहत मामले केवल डिवीजनल कमिश्नर और डीआईजी-रैंक ऑफिसर की दो सदस्यीय समिति के अनुमोदन के बाद ही दायर किए जाएंगे।

(बी) चार्जशीट दाखिल करने से पहले जोनल आईजी की अनुमति की आवश्यकता होगी।

(सी) संपत्ति को अदालत की अनुमति के साथ राज्य द्वारा अधिग्रहण किया जाएगा।

(डी) विशेष अदालत प्रस्तावित कानून के तहत मामलों की सुनवाई के लिए गठित की जाएगीं- एक राज्य स्तरीय संगठित अपराध नियंत्रण प्राधिकरण गठित करने का प्रस्ताव है।

सिविल सोसाइटी और कानून विशेषज्ञ ने भी यूपीकोका को बताया ‘काला कानून’…

रिहाई मंच- लखनऊ स्थित संघ, आतंकी मामलों में फंसे युवाओं के मामलों पर काम करने वाले इस संगठन ने कहा है कि इस “कठोर” विधेयक की शुरुआत के साथ ही सरकार “उनसे असंतुष्ट लोगो की आवाज को रोकने” की कोशिश कर रही है। रिहाई मंच के प्रमुख एडवोकेट मोहम्मद शोएब ने जनमंच न्यूज़ को बताया, “अन्य आपत्तिजनक प्रावधानों के अतिरिक्त, अभियोजन पक्ष के द्वारा आरोपों को साबित करने के बजाए आरोपी को अपनी मासूमियत साबित करने का प्रवाधान टाडा और पोटा जैसे कानून की याद दिलाता है, जिसके दुरुपयोग के बाद कानून वापस ले लिया गया था।”

अधिनियम के तहत मीडिया को लाने के बारे में उन्होंने कहा, “इसका मतलब न केवल विपक्ष को सताया जाना है बल्कि मीडिया को परेशान करने और अपराध के गहरे कुंए के बारे में लिखने से रोकने के लिए है। यह मीडिया के मुँह पर टेप लगाने का प्रयास है।”

“रिश्तेदारों और सहयोगियों से जेल मे मुलाकात की प्रक्रिया को जटिल बनाना, ईलाज के लिये मेडिकल बोर्ड की संस्तुति अनिवार्य करना न्यायिक हिरासत में होने वाले व्यक्ति से मूल अधिकारों का उल्लंघन है।”

“इस तरह के कठोर कानून के अभाव में भी यूपी सरकार ने पिछले छह महीनों में अपराधियों के उन्मूलन के नाम पर फर्जी मुठभेड़ों का एक भयानक अध्याय लिखा है, अगर प्रस्तावित विधेयक कानून बन जाए तो क्या होगा?” एडवोकेट शोएब नें कहा।

कानून और व्यवस्था में सुधार के वादे के साथ उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार सत्ता में आई, अपराधों को नियंत्रित करने के लिए एक नई रणनीति के तौर पर फर्जी मुठभेड़ मे होने वाली हत्याएं सामने आ रही हैं। सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले छह महीनों में 430 से ज्यादा मुठभेड़ हुई हैं, इसका मतलब कि प्रत्येक 12 घंटों में एक मुठभेड़ हुई। मुख्यमंत्री ने हाल ही में कहा था, “अपराधियों को जेलों में ठूँसा जाएगा या मुठभेड़ों में मार दिया जाएगा।” राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले को स्वंय संज्ञान में लेते हुये यूपी के मुख्य सचिव को नोटिस जारी कर इस मामले पर एक विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।

मानवाधिकार संगठन ने एक बयान में कहा, “एनएचआरसी ने उत्तर प्रदेश सरकार के बारे में मीडिया रिपोर्टों को सुओ मोटो के आधार पर संज्ञान मे ले लिया है। कथित रूप से, राज्य में कानून और व्यवस्था में सुधार के नाम पर पुलिस द्वारा मुठभेड़ों में हत्या का समर्थन किया है।”

“यह देखा गया है कि भले ही कानून और व्यवस्था की स्थिति गंभीर हो, राज्य इस तरह के तंत्र का सहारा नहीं ले सकता, जिसके परिणामस्वरूप कथित अपराधियों के अतिरिक्त न्यायिक हत्याएं हो सकती हैं। मुख्यमंत्री की रिपोर्ट में कहा गया है कि पुलिस और अन्य राज्य शासित बलों को उनकी इच्छा पर अपराधियों से निपटने के लिए एक स्वतंत्र हाथ दिया जा सकता है और संभवत: इससे सरकारी कर्मचारियों की शक्ति का दुरुपयोग हो सकता है।”

एनएचआरसी के बयान में कहा गया है, “यह एक सभ्य समाज के लिए अच्छा नहीं है कि डर के माहौल को विकसित किया जाये। राज्य द्वारा अपनाई गई कुछ नीतियों के कारण जीवन और समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।”