गांव के गाछ से लकडी तोड़ने से लेकर डॉक्टर बनने तक का सफर

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Dharmaveer Dharma

धर्मवीर धर्मा

वैशाली। डॉ. और सामाजिक कार्यकर्ता चंदन चौधरी वैशाली जिला के हरपुर ओस्ति गांव के रहने वाले है। जो कि पैसे से एम.बी.बी.एस डॉक्टर है। उनका जीवन बहुत संघर्षशील रहा है।

जब वो गांव में रहा करते थे, तो कई बार लकड़ी तोड़कर एवं पत्ता चुनकर लाते थे। उनका बचपन के कहानी संघर्षशील होने के साथ-साथ बहुत दिलचस्प भी है। बचपन में आम के सीजन में आम के गाछ में ज्यादा समय बिताते थे, एवं वर्षा के सीजन में नहर एवं तालाबो में खूब नहाया करते थें क्योंकि उनको तैराकी बहुत अच्छा लगता था।

गांव में पढ़ने के दौरान उन्होंने कई स्कूल बदला, अंत मे उनका दाखिल घर के पास वाले सरकारी स्कूल में हुआ, जहा बोरा रोजाना ले जाते थे बैठने के लिए, वहां वो तीसरी क्लास तक पढ़े। सौभाग्य से 2003 में उनके मझले भैया का रेलवे में नौकरी लग गया। उनका भैया डॉ. चौधरी के मेधा को देखते हुए अपने साथ 2004 में पटना पढ़ाने के लिए ले गए जहा उनका दाखिल आस-पास के सबसे अच्छा स्कूल में कराया।

उनका सब विषय मजबूत था लेकिन इंग्लिश कमजोर होने के वजह से उनका दाखिला “संत जॉर्ज एकेडमी” स्कूल के LKG क्लास में हुआ ।फिर एग्जाम दिए और बैच में तीसरा पोजीशन होने की वजह से उनका प्रमोशन पहली क्लास में हो गया। इसी तरह वो क्लास में तीसरा -चौथा पोजीशन बनाये रखें और प्रमोशन लेते रहें। पहली के बाद तीसरी,तीसरी के वाद पांचवी, पांचवी के बाद सातंवी और आठवीं एक स्कूल से पढ़ा।

डॉ. चौधरी स्कूल में अपने घर के चार लोगों के साथ पढ़ते थे, जिसमे उनका छोटा भाई एवं 2 भतीजा सामिल है।
पैसे के कमी के वजह से कई बार डॉ. चौधरी को स्कूल जाना बंद करना पड़ा, लेकिन वो डगमगाए नहीं और अपना पढ़ाई जारी रखा क्योंकि उनका सबसे बड़ा हिम्मत उनका भैया भाभी थें।

फिर बाद में उन्होंने नौंवी एवं दसवीं की पढ़ाई दूसरे स्कूल(शिवम कॉन्वेंट,कंकड़बाग) से किया। उनका इंटरेस्ट मेडिकल में देख उनके भैया उनको कोटा भेज दिए। उसके बाद वो एलेन कोटा से मेडिकल का तैयारी किये एवं पहली ही प्रयास में इतने कठिन परीक्षा को पास कर “एम.बी. बी.एस” में दाखिला लिया।

अपना सफलता के श्रेय सबसे पहले भैया एवं भाभी को देते हुते माता-पिता, घर वाले लोग, स्कूल और एलेन के शिक्षक एवं बाबा साहब अम्बेडकर को देते हैं। दरभंगा मेडिकल कॉलेज में जाने के बाद बहुत से संगठन के विचार धारा से प्रभावित हुए और पढ़ाई के साथ-साथ सामाजिक कार्य मे लग गए।

एम.बी.बी.एस के इतने बड़े सिलेबस होने के बाद भी जब भी उनको मौका मिलता है वो समाज के बीच में जाना पसंद करते हैं। उनका विश्वास “पे बैक टू सोसाइटी” में है। शिक्षा एवं समाज पे काम करने वाले संगठन को समय-समय पे आर्थिक एवं शारीरिक सहयोग भी देते रहते हैं।
समाज को शिक्षा के प्रति जागरूक करने में उनका अहम भूमिका है।

डॉ. चौधरी अपने को नास्तिक बताते है एवं किसी भी अवतार में विश्वास नही करते हैं। वो अंधविश्वास एवं कुरीतियों के खिलाफ हमेसा से बोलते रहें है जिसमे मृत्यु भोज, बाल विवाह,बेटियों को सरकारी स्कूल में पढ़ाना एवं बेटो को प्राइवेट में पढ़ाना, वृधो को जीते में खाना सही से नही देना एवम मरने के बाद मध-मखाना खिलाना, किसी के मृत्यु पे कर्म कांड पे कर्ज लेकर खर्च करना इत्यादि शामिल है।

शोषित, वंचित एवं गांव के छुटे हुए बच्चे को शिक्षा के मुख्य धारा से जोड़ने के लिए उन्होंने निशुल्क शिक्षा केंद्र, डॉ. आंबेडकर शिक्षा केंद्र के नाम से खोला, जिसमें उन्होंने इंटर्नशिप में मिला सारा स्टाइपेंन वाला पैसा लगा दिया एवं खुद व कुदाल चलाया ताकि जल्द से जल्द केंद्र खुल सके, जहा बर्तमान में 65 बच्चे पढ़ते है। इस केंद्र पे आधुनिक शिक्षा दी जाती है, जिसमें कंप्यूटर शिक्षा भी शामिल है।

उनका सपना है कि अपने जैसे कुछ अधिकारी/पदाधिकारी बनाये। इस केंद्र पे नेतरहाट,सैनिक स्कूल, नवोदय स्कूल इत्यादि के परीक्षा की तैयारी भी करवाते हैं। डॉ चौधरी बताते है कि ये केंद्र बिल्कुल निशुल्क एवं प्राइवेट है जिसको चलाने में उनका सहयोग उनके भाई लोग, कुछ अधिकारी/पदाधिकारी, डॉक्टर/इंजीनियर एवं सामाजिक कार्यकर्ता लोग करते हैं। बिल्कुल बाबासाहब के विचारों पे चलने वाले डॉ. चंदन चौधरी कहते हैं कि एक रोटी कम खाओ लेकिन बच्चों को जरूर पढ़ाओ।